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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 535 में से

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पृष्ठ 288

सूत्र-४८ 241
इसी प्रकार कुरुक्षेत्र में, गङ्गा के अञ्चलों, नैमिषारण्य, कुब्जक्षेत्र, आम्रक
(उत्कल क्षेत्र) तथा महाकाल¹ के वनों में, सिद्धायतन, तीर्थों में और नदियों के
संगमों पर, उर्वरी में, श्मशानों में, चौराहों पर, जलाशयों के निकट, सुन्दर भूभागों
पर तथा पहाड़ियों में स्थित गुफाओं में, वनों तथा उपवन-बाग-बगीचों और जहाँ
कहीं भी मन लग जाय ऐसे सुलभ स्थान पर (भूमि को ग्रहण करने पर विचार
करना चाहिए।)
नगरग्रामपूर्मध्ये खेटके चैव कर्वटे।
तडागकूपमाश्रित्य प्रसिद्धनृपमार्गके ॥ 9 ॥
प्रपादे कुलसम्भवे कुर्याद्वैशवमण्डपम्।
जनालयदिक्कुड्यानि वापिद्वार्युता तथा ॥ 10 ॥
कोई नगर-पुर या ग्राम हो, खेटक (खेड़ा) अथवा कर्वट हो, उनके बीच और
प्रसिद्ध राजमार्ग पर तालाब और कूपों को बनाया जाना चाहिए। यदि राजकुलों के
अपने' शवमण्डप या समाधियों का क्षेत्र हो तो वहाँ पर बावड़ी हो और जनालय
(लोगों का आवास और धर्मशाला हो) या चारदिवारी हो तो द्वारों सहित बावड़ी
बनवाएँ।²
शुभे दिने शुभे ऋक्षे सुलग्ने सुमुहूर्तके।
आदौ च भूपरीक्षायां शकुनं हि विलोकयेत् ॥ 11 ॥

  1. महाकाल के वनों का वर्णन स्कन्दपुराण के आवन्तिखण्ड में सम्यक् प्रकार से आया है।
  2. देवालयचन्द्रिका में कहा गया है कि किसी तीर्थ की सीमा में, नदी के तट पर, सरोवर के तीर पर,
    नदियों के सङ्गम पर, पर्वतों व पहाड़ों के आगे, वन-उपवन, उद्यानों में और सिद्धों के आश्रम या
    गुरुकुल, ग्राम, पुर, पत्तन अथवा देश में कहीं सुन्दर स्थल पर देवताओं के लिए प्रासाद निर्माण के लिए
    भूमि का चयन करना चाहिए। ऐसी भूमि देवालयों के निर्माण की दृष्टि से श्रेष्ठ है जहाँ पर कर्पूर, अगरु,
    नारियल, तिलक, दर्भ, कदम्ब, अर्जुन, मालेय, क्रमुक या सुपाड़ी, इक्षु, केतकी, कुश, कुन्द, कमल,
    उत्पलादि की उपज होती हों। ऐसा स्थल जहाँ पर कि जल का प्रवाह पूर्व की ओर होता हो अर्थात्
    भूमि का प्लव पूर्व की ओर हो, जो भूमि बहुत जल वाली हो अथवा जहाँ उचित सुविधाएं हों, शान्ति
    हों, देवाधिपति का यजन होता हो और कमलों से परिपूर्ण पृथ्वी हो, वह देवालय के लिए सर्वथा उचित
    है— तीर्थान्ते तटिनीतटे जलनिधेस्तीरे सरित्सङ्गमे शैलाग्रेऽद्रितटे वनोपवनयोद्यानदेशे तथा।
    सिद्धाद्यायतनेषु वा गुरुवरो ग्रामे पुरे पत्तने देशेऽन्यत्र मनोरमे सुरसमिज्यायै क्षितिं कल्पयेत्॥
    कर्पूरागरुनालिकेर तिलकैर्दर्भैः कदम्बार्जुनैर्मालेयैः क्रमुकेक्षुकेतककुशैः कुन्दारविन्दोत्पलैः।
    पूर्वोदक्प्लवशालिनी बहुजला वा या दरीदृश्यते सेयं शान्तिकरी सुरेशयजने सूक्ता सुपद्मा मही॥ तीरे
    वारिनिधेः श्रिताथ सरितस्तीर्थस्य वा दक्षिणे व्रीहि- क्षेत्रविचित्रिताप्यदिशि यज्ञार्हाङ्घ्रिपैरङ्किता। कीर्णा
    पूर्वफलप्रसूतनरभिर्योद्यानहृद्यापि वा भद्रा सा परिगीयते वसुमती प्रीतिप्रदा यज्वनाम्॥ (देवालय. 2-4
    एवं तन्त्रसमुच्चय 1, 28, 39-40)