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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 535 में से

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पृष्ठ 258

सूत्र-४३ 211
दिन नक्षत्र के विषय में कहा जा रहा है कि उदय के आधे में घटियाँ पैंतालीस
होती है ? अभ्र के मध्य में तारा होती है और शेष पूर्ववत् क्रमानुसार ही होते हैं।
साध्यां तिथिं च द्विःकृत्य षड्भिर्भागैर्विवर्जिता ।
तिथिभुक्तिसमायुक्ता रविकां विपरीततः ? ॥ 46 ॥
ऋणं त्यक्त्वर्क्षघटिका शेषा भुक्तिरथोच्यते ।
असाध्यघटिकामध्ये त्यक्ता शेषा च भुक्तिका ॥ 47 ॥
तिथि को साधकर उसका दुगुना करें और उसे छह से भाग नहीं दें तथा तिथि
भुक्ति को समायुक्त करके रवि को विपरीत करके ?, ऋण छोड़कर नक्षत्रों की
घटिका शेष भुक्ति कही जाती है। असाध्य घटिकाओं के मध्य में शेष को छोड़कर
भुक्ति कहा जाता है।
ध्रुवं कृत्वा तिथिं युक्त्वा ऋक्षसङ्ख्याधिकं यदि ।
षष्ठ्याधिके ऋक्षं त्यक्त्वा ऋणाधिको रिषवृद्धये ? ॥ 48 ॥
इति दिननक्षत्राधिकारः ।
ध्रुव को तिथि में जोड़कर यदि नक्षत्रों की संख्या अधिक हो तो साठ से
अधिक नक्षत्र को छोड़कर ऋण अधिक करके ?
महानक्षत्रभुक्त्यधिकारः —
तिथिं चतुर्गुणीकृत्य ऋक्षघटीविमिश्रितम् ।
रथिका तिथिं क्रमशः ऋक्षभुक्तिं प्रभाषते ॥ 49 ॥
तिथि को चौगुनी करके नक्षत्र की घटी मिलाएँ। रथिका तिथि को क्रम से
नक्षत्र युक्ति कहा जाता है।
षष्टिभागे लब्धमृक्षं शेषा भुक्तिः प्रकीर्तिता ।
ध्रुवं कृत्वा लब्धं योज्यं शेषं वै ऋक्षभुक्तिभिः ॥ 50 ॥
इति महानक्षत्रभुक्त्यधिकारः ।
साठ का भाग देने पर जो नक्षत्र आए, उसमें शेष को भुक्ति कहा जाता है। ध्रुव
में लब्ध को जोड़ने पर जो शेष बचे, उसे नक्षत्र में जोड़ें।
योग आनयनाधिकारः —
चन्द्रभुक्तिर्दिनक्षं च सूर्यस्यात महारिषम् ? ।
सदा धनं चन्द्रभुक्ति ? सूर्यभुक्तिर्ऋणं तथा ॥ 51 ॥
चन्द्र की भुक्ति और दिन के नक्षत्र को सूर्य से महारिषम ? चन्द्र युक्ति सदा धन
होती है ? और सूर्य की भुक्ति सदा ही ऋण होती है।