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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 535 में से

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पृष्ठ 256

सूत्र-४३ 209
तथा दो तिथियों को तीन से अधिक रखते हुए इस प्रकार आदि गुणों के साथ तिथि,
वारों की भुक्ति एवं वृद्धि होती है।
अथार्कनाड्यानुक्रमाह —
त्रिषट्कं कर्कमकरे सिंहे कुम्भ चाष्टादश ॥ ३३ ॥
कन्यामीने रुद्ररुद्रास्तुलामेषे दशाष्टकम्।
अष्टषड् वृश्चिकवृषे धनुर्युग्मे त्रिशून्यकम् ॥ ३४ ॥
सङ्क्रान्तियोगे दातव्या रविका च विनिर्गता।
युग्मसिद्धार्थपक्षे तु द्वौ पक्षौ शब्दतो न्यसेत्।
एवमादिक्रमोक्तश्च रविनाड्या अनुक्रमः ॥ ३५ ॥
इति तिथिभुक्त्यधिकारः।
तीन षट्क कर्क और मकर राशि में और आठ दस सिंह व कुम्भ राशि में,
ग्यारह ग्यारह कन्या व मीन राशि में और दस एवं आठ तुला व मेष राशि में, आठ
और छह वृश्चिक एवं वृष राशि में, दो धनु में और तीन शून्यक होती है। संक्रान्ति
योग में रवि के विनिर्गत यानी निकलने के अनुसार देनी चाहिए। सिद्धार्थ पक्ष में दो
पक्षों को शब्द से रखें। इस प्रकार से आदि क्रमानुसार सूर्य-नाड़ियों का अनुक्रम
होता है।
सङ्क्रान्तिवर्तमानाधिकारमाह —
युगादि साधयेत् पूर्वं नष्टानयनकं क्रमात्।
तदङ्कं स्थापयेदेवं सङ्क्रान्त्या ध्रुवसाधना ॥ ३६ ॥
संक्रान्ति मान के लिए पहले युगादि साधन करें, तदोपरान्त क्रम से नष्ट अयन को
करें। पुनः उनके अङ्कों को स्थापित करें जिससे संक्रान्ति का ध्रुव साधन हो सके।
तदाकं षट् अग्नि ऋतुदं सन्निभिः स्थापयेत् ?
अत्यंतिथी गुणमेर्थ अप्रयोजयेत् षष्टिभिर्भागः ? ॥ ३७ ॥
उसके अङ्कों को छह, तीन, छह सत्रों में स्थापित करें? अन्त्य तिथि को इस
तरह गुणित करें और साठ का भाग अप्रयोजित करें।
लब्धं फलं च मूलं च सर्व शशिनियोजयेत् ?।
सप्तप्रेसित सङ्क्रान्तीवकयुगाद्याअङ्गतोद्द्ववा ? ॥ ३८ ॥
इस तरह से लब्ध फल और मूल को सभी को एक नियोजित करके जोड़ें।
सात संक्रान्ति को प्रेसित करें और वकयुगादि से अङ्कों का उद्भव लें।