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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 535 में से

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पृष्ठ 254

सूत्र-४३ 207
एवं ध्रुवः क्रमात्साध्यो मासान्तेषु पुनः पुनः।
अमान्ते च ध्रुवः साध्यस्तिथिं पश्चात् प्रवर्तयेत् ॥ 20 ॥
इस प्रकार ध्रुव स्थिराङ्क क्रमपूर्वक, साधते हुए मास के अन्त में बारम्बार
अमावस्या तक स्थिराङ्क बनाएँ जिससे तिथियाँ बनती हैं।
वारस्थाने तिथियोंज्या ?¹ हरेद्भागं तु सप्तभिः ।
यच्छेषं लभ्यते वारस्तेषु तिथिं तद्भाषिता ? ॥ 21 ॥
वार के स्थान पर तिथि को लगाकर ? उसमें सात का भाग दें और जो शेष बचें
उसे वार और उसी से तिथि कही जाती है ?।
तिथिपिण्डं पुनर्भक्त्या भागं स्याद्वै द्विसप्तभिः ।
भागमध्ये धनं ख्यातं लब्धिमध्ये ऋणं तथा ॥ 22 ॥
तिथियों की पिण्ड राशि बनाकर उसे चौदह से भाग दें और योग के बीच धन
विख्यात् होता है और लब्धि मध्य में ऋण विख्यात होता है।
द्वितीयोर्ध्वं धनं ख्यातं तृतीयोर्ध्वमृणं तथा ।
चतुर्थोर्ध्वे धनं चैव षष्ठात्परं न विद्यते ॥ 23 ॥
भागात्परं वदेद्वाचः ? यच्छेषं तत्र तिष्ठति ।
शब्दयोगं च सन्त्यज्य शब्दाख्यं चैव स्थापयेत् ॥ 24 ॥
द्वितीया के ऊपर धन और तृतीया के ऊपर ऋण विख्यात् होता है, फिर चतुर्थी
के ऊपर धन और छह से परे धन नहीं होता। भाग के बाद वाच कहे ? जहाँ चाहे
वहाँ रखे और शब्दयोग को छोड़ कर शब्दाख्य को भी स्थापित करें।
नाड़ीज्ञानमाह —
आद्ये त्रयोदशे पञ्च द्वितीये द्वादशे दश ।
एकादशे तृतीये च नाड्यः पञ्चदश स्मृताः ॥ 25 ॥
चतुर्थे दशमे तु स्यादेकोनविंशतिस्तु ताः ।
पञ्चमे नवमे नाड्यो द्वाविंशतिरुदाहृताः ॥ 26–1 ॥
पहली से तेरह तक पाँच, दूसरी से बारह तक दस, तीसरी से ग्यारह तक नाड़ी
पन्द्रह होती है। चौथे से दशम तक उन्नीस होती हैं। पाँचवें से नवें तक नाड़ी बाईस
कही गई है।
षष्ठेऽष्टमे च घटिकाश्चतुर्विंशतिरीरिताः ।
१. 'वारस्थानैर्विदैवोंत्य' इति न. पा.।