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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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86 अपराजितपृच्छा
अर्थात् तीन सौ साठ दिनों से (सौर) वर्ष बनता है¹ और इस तरह पूरे युक्तिक्रम से
संवत्सर के नामों को बताया गया है।
अथ प्रभवादिशष्ठिसंवत्सरनामानि —
संवत्सराभिधानानि षष्टिः स्युः प्रभवादितः ।
प्रभवो विभवश्चैव शुक्लो मोदः प्रजापतिः ॥ २२ ॥
अङ्गिराः श्रीमुखो भावो युवा धाता तथेश्वरः ।
बहुधान्यः प्रमाथी च विक्रमो वृष एव च ॥ २३ ॥
चित्रभानुः सुभानुश्च तारणः पार्थिवो व्ययः ।
सर्वजित्सर्वधारी च विरोधी विकृतिः खरः ॥ २४ ॥
नन्दनो विजयो जयो मन्मथो दुर्मुखस्तथा ।
हेमलम्बो विलम्बश्च विकारी शर्वरी तथा ॥ २५ ॥
प्लवश्च शुभकृच्चैव शोभनः क्रोधनस्तथा ।
विश्वावसुः पराभवः प्लवङ्गः कीलको मतः ॥ २६ ॥
सौम्यः साधारणश्चैव तथैवं च विरोधकृत् ।
परिधावी प्रमादी च ह्यानन्दो राक्षसोऽनलः ॥ २७ ॥
पिङ्गलः कालयुक्तश्च सिद्धार्थो रौद्रदुर्मती ।
दुन्दुभी रुधिरोद्गारी रक्ताक्षी क्रोधनः क्षयः ॥ २८ ॥
इत्थं संवत्सराणां च षष्ठीभेदाः प्रकीर्तिताः ।
प्रभवादि से कुल साठ संवत्सर होते हैं जिनके नाम क्रमशः निम्न हैं— (1.)
प्रभव, (2.) विभव, (3.) शुक्ल, (4.) मोद, (5.) प्रजापति, (6.) अङ्गिरा,
(7.) श्रीमुख, (8.) भाव, (9.) युवा, (10.) धाता, (11.) ईश्वर, (12.)
बहुधान्य, (13.) प्रमाथी, (14.) विक्रम, (15.) वृष, (16.) चित्रभानु, (17.)
सुभानु, (18.) तारण, (19.) पार्थिव, (20.) व्यय, (21.) सर्वजित्, (22.)
सर्वधारी, (23.) विरोधी, (24.) विकृत, (25.) खर, (26.) नन्दन, (27.)
विजय, (28.) जय, (29.) मन्मथ, (30.) दुर्मुख, (31.) हेमलम्ब, (32.)
विलम्ब, (33.) विकारी, (34.) शर्वरी, (35.) प्लव, (36.) शुभकृत्, (37.)
शोभन, (38.) क्रोधी, (39.) विश्वावसु, (40.) पराभव, (41.) प्लवङ्ग, (42.)

  1. कुल 360 दिन का सौर वर्षमान होता है। ज्योतिर्विदाभरण में आया है ; सौरा नभो₀ऽङ्गा₆ग्नि₃मितानी
    वासरा। (ज्योतिर्विदाभरण प्रथम प्रकरण, 25)