अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-१९ 83
कथयस्व प्रसादेन विश्वेश जगतांपते ॥ २ ॥
अपराजित बोले — हे देव ! अष्टयामादिक काल संख्या कितनी है, आप कृपा
करके तिथि, संवत्सरादि उन सबको कहें। सभी संवत्सरों के नामों को प्रमाणपूर्वक
पृथक्-पृथक् समझाएँ। हे जगत्पते ! विश्वेश !! इस बारे में आपका कृपा-प्रसाद
चाहिए।
विश्वकर्मोवाच —
अहोरात्रादितः सङ्ख्या दृष्टे सूर्योदये मता ।
अष्टौ यामाश्च सम्प्रोक्ता अहोरात्रसमुद्भवाः ॥ ३ ॥
जयो विजय आख्यातो महाशङ्कश्च शङ्कुकः ।
उदयाद्धि समाख्याताश्चत्वारश्च निशापतेः ॥ ४ ॥
विश्वकर्मा ने कहा — दिन-रातों की संख्या सूर्य के उदय होने के साथ देखकर
मानी गई है। इन दिन-रातों में आठ याम होते हैं, ऐसा पहले (सूत्र 18) कहा गया
है। उदयात् ही से निशापति या चन्द्रमा के चारों (1.) जय, (2.) विजय, (3.)
महाशङ्कु, और (4.) शङ्कुक ये (याम) कहे गए हैं।
अथ तिथ्यादीनामाह —
अहोरात्रैस्तिथेर्नाम प्रोक्तं नन्दादिपञ्चकम् ।
नन्दा भद्रा जया रिक्ता पूर्णा वै पञ्चमी स्मृता ॥ ५ ॥
पञ्च पञ्च पुनः पञ्च मासार्धे तिथयस्तथा ।
तिथिभिः पञ्चदशभिः पक्षो मासो द्विपक्षतः ॥ ६ ॥
दिन-रातों के तिथियों के नाम नन्दादि पाँच क्रम से कहे गए हैं— नन्दा (1,
6, 11), भद्रा (2, 7, 12), जया (3, 8, 13), रिक्ता (4, 9, 14) और पाँचवीं
पूर्णा (5, 10, 15, 30) तिथियाँ हैं। इस प्रकार मासार्ध में ये पाँच-पाँच और पाँच
तीन बार तिथियाँ होती हैं। ऐसी पन्द्रह तिथियों से पक्ष या पखवाड़ा बनता है और
दो पक्षों से एक मास होता है।
तथा च स्पष्टाह—
आदौ नन्दादिकश्चैवं कालः स्याद् दशपञ्चभिः$_{15}$ ।
नन्दा प्रतिगदा$_1$ ज्ञेया द्वितीया$_2$ भद्रिका मता ॥ ७ ॥
तृतीया$_3$ च जया रिक्ता चतुर्थी$_4$ सम्प्रकीर्तिता ।
तिथिः पूर्णा पञ्चमी$_5$ स्यादेवं हि तिथयो मताः ॥ ८ ॥