अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह सुनकर ब्राह्मणने उस श्रेष्ठ राजाको उत्तर दिया—'महाराज! आपके अधिकारमें
जितना देश है, उसकी सीमा बताइये ॥ ३ ॥
सोऽन्यस्य विषये राज्ञो वस्तुमिच्छाम्यहं विभो ।
वचस्ते कर्तुमिच्छामि यथाशास्त्रं महीपते ॥ ४ ॥
'सामर्थ्यशाली नरेश! इस बातको जानकर मैं दूसरे राजाके राज्यमें निवास करना
चाहता हूँ और शास्त्रके अनुसार आपकी आज्ञाका पालन करना चाहता हूँ' ॥ ४ ॥
इत्युक्तस्तु तदा राजा ब्राह्मणेन यशस्विना ।
मुहुरुष्णं विनिःश्वस्य न किंचित् प्रत्यभाषत ॥ ५ ॥
उस यशस्वी ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर राजा जनक बार-बार गरम उच्छ्वास लेने लगे,
कुछ जवाब न दे सके ॥ ५ ॥
तमासीनं ध्यायमानं राजानममितौजसम् ।
कश्मलं सहसागच्छद् भानुमन्तमिव ग्रहः ॥ ६ ॥
वे अमित तेजस्वी राजा जनक बैठे हुए विचार कर रहे थे, उस समय उनको उसी
प्रकार मोहने सहसा घेर लिया जैसे राहु ग्रह सूर्यको घेर लेता है ॥ ६ ॥
समाश्वास्य ततो राजा विगते कश्मले तदा ।