अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 67, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंमैं सम्पूर्ण कामनाओंमेंसे किसीकी कामना नहीं करता। समस्त दोषोंसे भी कभी द्वेष
नहीं करता। जैसे कमलके पत्तोंपर जल-बिन्दुका लेप नहीं होता, उसी प्रकार मेरे स्वभावमें
राग और द्वेषका स्पर्श नहीं है ॥ ४ ॥
नित्यस्य चैतस्य भवन्त्यनित्या
निरीक्ष्यमाणस्य बहुस्वभावान् ।
न सज्जते कर्मसु भोगजालं
दिवीव सूर्यस्य मयूखजालम् ॥ ५ ॥
जिनका स्वभाव बहुत प्रकारका है, उन इन्द्रिय आदिको देखनेवाले इस नित्यस्वरूप
आत्माके लिये सब भोग अनित्य हो जाते हैं। अतः वे भोगसमुदाय उस विद्वान्को उसी
प्रकार कर्मोंमें लिप्त नहीं कर सकते, जैसे आकाशमें सूर्यकी किरणोंका समुदाय सूर्यको
लिप्त नहीं कर सकता ॥ ५ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
अध्वर्युयतिसंवादं तं निबोध यशस्विनि ॥ ६ ॥
यशस्विनि! इस विषयमें अध्वर्यु और यतिके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण
दिया जाता है, तुम उसे सुनो ॥ ६ ॥
प्रोक्ष्यमाणं पशुं दृष्ट्वा यज्ञकर्मण्यथाब्रवीत् ।
यतिरध्वर्युमासीनो हिंसेयमिति कुत्सयन् ॥ ७ ॥
किसी यज्ञ-कर्ममें पशुका प्रोक्षण होता देख वहीं बैठे हुए एक यतिने अध्वर्युसे उसकी
निन्दा करते हुए कहा—'यह हिंसा है (अतः इससे पाप होगा)' ॥ ७ ॥
तमध्वर्युः प्रत्युवाच नायं छागो विनश्यति ।
श्रेयसा योक्ष्यते जन्तुर्यदि श्रुतिरियं तथा ॥ ८ ॥
अध्वर्युने यतिको इस प्रकार उत्तर दिया—'यह बकरा नष्ट नहीं होगा। यदि 'पशुर्वे
नीयमानः' इत्यादि श्रुति सत्य है तो यह जीव कल्याणका ही भागी होगा ॥ ८ ॥
यो ह्यस्य पार्थिवो भागः पृथिवीं स गमिष्यति ।
यदस्य वारिजं किंचिदपस्तत् सम्प्रवेक्ष्यति ॥ ९ ॥
'इसके शरीरका जो पार्थिव भाग है, वह पृथ्वीमें विलीन हो जायगा। इसका जो कुछ
भी जलीय भाग है, वह जलमें प्रविष्ट हो जायगा ॥ ९ ॥
सूर्य चक्षुर्दिशः श्रोत्रं प्राणोऽस्य दिवमेव च ।
आगमे वर्तमानस्य न मे दोषोऽस्ति कश्चन ॥ १० ॥
'नेत्र सूर्यमें, कान दिशाओंमें और प्राण आकाशमें ही लयको प्राप्त होगा। शास्त्रकी
आज्ञाके अनुसार बर्ताव करनेवाले मुझको कोई दोष नहीं लगेगा' ॥ १० ॥
यतिरुवाच