अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 66, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टाविंशोऽध्यायः
ज्ञानी पुरुषकी स्थिति तथा अध्वर्यु और यतिका संवाद*
ब्राह्मण उवाच
गन्धान् न जिघ्रामि रसान् न वेद्मि
रूपं न पश्यामि न च स्पृशामि ।
न चापि शब्दान् विविधान् शृणोमि
न चापि संकल्पमुपैमि कंचित् ॥ १ ॥
ब्राह्मण कहते हैं—मैं न तो गन्धोंको सूँघता हूँ, न रसोंका आस्वादन करता हूँ, न
रूपको देखता हूँ, न किसी वस्तुका स्पर्श करता हूँ, न नाना प्रकारके शब्दोंको सुनता हूँ और
न कोई संकल्प ही करता हूँ ॥ १ ॥
अर्थानिष्टान् कामयते स्वभावः
सर्वान् द्वेष्यान् प्रद्विषते स्वभावः ।
कामद्वेषावुद्भवतः स्वभावात्
प्राणापानौ जन्तुदेहान्निविश्य ॥ २ ॥
स्वभाव ही अभीष्ट पदार्थोंकी कामना रखता है, स्वभाव ही सम्पूर्ण द्वेष्य वस्तुओंके
प्रति द्वेष करता है। जैसे प्राण और अपान स्वभावसे ही प्राणियोंके शरीरोंमें प्रविष्ट होकर
अन्न-पाचन आदिका कार्य करते रहते हैं, उसी प्रकार स्वभावसे ही राग और द्वेषकी उत्पत्ति
होती है। तात्पर्य यह कि बुद्धि आदि इन्द्रियाँ स्वभावसे ही पदार्थोंमें बर्त रही हैं ॥ २ ॥
तेभ्यश्चान्यांस्तेषु नित्यांश्च भावान्
भूतात्मानं लक्षयेरन् शरीरे ।
तस्मिंस्तिष्ठन्नास्मि सक्तः कथंचित्
कामक्रोधाभ्यां जरया मृत्युना च ॥ ३ ॥
इन बाह्य इन्द्रियों और विषयोंसे भिन्न जो स्वप्न और सुषुप्तिके वासनामय विषय एवं
इन्द्रियाँ हैं तथा उनमें भी जो नित्यभाव हैं, उनसे भी विलक्षण जो भूतात्मा है, उसको
शरीरके भीतर योगीजन देख पाते हैं। उसी भूतात्मामें स्थित हुआ मैं कहीं किसी तरह भी
काम, क्रोध, जरा और मृत्युसे ग्रस्त नहीं होता ॥ ३ ॥
अकामयानस्य च सर्वकामा-
नविद्विषाणस्य च सर्वदोषान् ।
न मे स्वभावेषु भवन्ति लेपा-
स्तोयस्य बिन्दोरिव पुष्करेषु ॥ ४ ॥