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सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 421 में से

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पृष्ठ 385

पाण्डवाश्च महीपालैः समेतैरभिसंवृताः ।
अशोभन्त महाराज ग्रहास्तारागणैरिव ॥ ३१ ॥
महाराज! वहाँ आये हुए समस्त भूपालोंसे घिरे हुए पाण्डवलोग ऐसी शोभा पा रहे थे,
मानो तारोंसे घिरे हुए ग्रह सुशोभित हों ॥ ३१ ॥
राजभ्योऽपि ततः प्रादाद् रत्नानि विविधानि च ।
गजानश्वानलंकारान् स्त्रियो वासांसि काञ्चनम् ॥ ३२ ॥
तदनन्तर पाण्डवोंने यज्ञमें आये हुए राजाओंको भी तरह-तरहके रत्न, हाथी, घोड़े,
आभूषण, स्त्रियाँ, वस्त्र और सुवर्ण भेंट किये ॥ ३२ ॥
तद् धनौघमपर्यन्तं पार्थः पार्थिवमण्डले ।
विसृजन् शुशुभे राजन् यथा वैश्रवणस्तथा ॥ ३३ ॥
राजन्! उस अनन्त धनराशिको भूपालमण्डलमें बाँटते हुए कुन्तीकुमार युधिष्ठिर
कुबेरके समान शोभा पाते थे ॥ ३३ ॥
आनीय च तथा वीरं राजानं बभ्रुवाहनम् ।
प्रदाय विपुलं वित्तं गृहान् प्रास्थापयत् तदा ॥ ३४ ॥
तत्पश्चात् वीर राजा बभ्रुवाहनको अपने पास बुलाकर राजाने उसे बहुत-सा धन देकर
विदा किया ॥ ३४ ॥
दुःशलायाश्च तं पौत्रं बालकं भरतर्षभ ।
स्वराज्येऽथ पितुर्धीमान् स्वसुः प्रीत्या न्यवेशयत् ॥ ३५ ॥
भरतश्रेष्ठ! अपनी बहिन दुःशलाकी प्रसन्नताके लिये बुद्धिमान् युधिष्ठिरने उसके बालक
पौत्रको पिताके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया ॥ ३५ ॥
नृपतींश्चैव तान् सर्वान् सुविभक्तान् सुपूजितान् ।
प्रस्थापयामास वशी कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ ३६ ॥
जितेन्द्रिय कुरुराज युधिष्ठिरने सब राजाओंको अच्छी तरह धन दिया और उनका
विशेष सत्कार करके उन्हें विदा कर दिया ॥ ३६ ॥
गोविन्दं च महात्मानं बलदेवं महाबलम् ।
तथान्यान् वृष्णिवीरांश्च प्रद्युम्नाद्यान् सहस्रशः ॥ ३७ ॥
पूजयित्वा महाराज यथाविधि महाद्युतिः ।
भ्रातृभिः सहितो राजा प्रास्थापयदरिंदमः ॥ ३८ ॥
महाराज! इसके बाद महात्मा भगवान् श्रीकृष्ण, महाबली बलदेव तथा प्रद्युम्न आदि
अन्यान्य सहस्रों वृष्णिवीरोंकी विधिवत् पूजा करके भाइयोंसहित शत्रुदमन महातेजस्वी
राजा युधिष्ठिरने उन सबको विदा किया ॥ ३७-३८ ॥
एवं बभूव यज्ञः स धर्मराजस्य धीमतः ।
बह्वन्नधनरत्नौघः सुरामैरेयसागरः ॥ ३९ ॥