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सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 384, कुल 421 में से

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पृष्ठ 384

इस प्रकार पृथ्वीके मूल्यके रूपमें वह सुवर्ण देकर राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंसहित
बहुत प्रसन्न हुए। उनके सारे पाप धुल गये और उन्होंने स्वर्गपर अधिकार प्राप्त कर
लिया ॥ २२ ½ ॥
ऋत्विजस्तमपर्यन्तं सुवर्णनिचयं तथा ॥ २३ ॥
व्यभजन्त द्विजातिभ्यो यथोत्साहं यथासुखम् ।
उस अनन्त सुवर्णराशिको पाकर ऋत्विजोंने बड़े उत्साह और आनन्दके साथ उसे
ब्राह्मणोंको बाँट दिया ॥ २३ ½ ॥
यज्ञवाटे च यत् किंचिद् हिरण्यं सविभूषणम् ॥ २४ ॥
तोरणानि च यूपांश्च घटान् पात्रीस्तथेष्टकाः ।
युधिष्ठिराभ्यनुज्ञाताः सर्वं तद् व्यभजन् द्विजाः ॥ २५ ॥
यज्ञशालामें भी जो कुछ सुवर्ण या सोनेके आभूषण, तोरण, यूप, घड़े, बर्तन और ईंटें
थीं, उन सबको भी युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर ब्राह्मणोंने आपसमें बाँट लिया ॥ २४-२५ ॥
अनन्तरं द्विजातिभ्यः क्षत्रिया जहिरे वसु ।
तथा विट्शूद्रसंघाश्च तथान्ये म्लेच्छजातयः ॥ २६ ॥
ब्राह्मणोंके लेनेके बाद जो धन वहाँ पड़ा रह गया, उसे क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा म्लेच्छ
जातिके लोग उठा ले गये ॥ २३ ॥
ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे मुदिता जग्मुरालयान् ।
तर्पिता वसुना तेन धर्मराजेन धीमता ॥ २७ ॥
तदनन्तर सब ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक अपने घरोंको गये। बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरने
उन सबको उस धनके द्वारा पूर्णतः तृप्त कर दिया था ॥ २७ ॥
स्वमंशं भगवान् व्यासः कुन्त्यै साक्षाद्धि मानतः ।
प्रददौ तस्य महतो हिरण्यस्य महाद्युतिः ॥ २८ ॥
उस महान् सुवर्णराशिमेंसे महातेजस्वी भगवान् व्यासने जो अपना भाग प्राप्त किया
था, उसे उन्होंने बड़े आदरके साथ कुन्तीको भेंट कर दिया ॥ २८ ॥
श्वशुरात् प्रीतिदायं तं प्राप्य सा प्रीतमानसा ।
चकार पुण्यकं तेन सुमहत् संघशः पृथा ॥ २९ ॥
श्वशुरकी ओरसे प्रेमपूर्वक मिले हुए उस धनको पाकर कुन्तीदेवी मन-ही-मन बहुत
प्रसन्न हुईं और उसके द्वारा उन्होंने बड़े-बड़े सामूहिक पुण्य-कार्य किये ॥ २९ ॥
गत्वा त्ववभृथं राजा विपाप्मा भ्रातृभिः सह ।
सभाज्यमानः शुशुभे महेन्द्रस्त्रिदशैरिव ॥ ३० ॥
यज्ञके अन्तमें अवभृथस्नान करके पापरहित हुए राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंसे
सम्मानित हो इस प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे देवताओंसे पूजित देवराज इन्द्र सुशोभित
होते हैं ॥ ३० ॥