अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 362, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंकारयामास धर्मात्मा तत्र तत्र यथाविधि ॥ १५ ॥
ब्राह्मणानां च वेश्मानि नानादेशसमीयुषाम् ।
कारयामास कौन्तेयो विधिवत् तान्यनेकशः ॥ १६ ॥
वहाँ सुवर्णमय विचित्र खम्भे और बड़े-बड़े तोरण (फाटक) बने हुए थे। धर्मात्मा भीमने
यज्ञमण्डपके सभी स्थानोंमें शुद्ध सुवर्णका उपयोग किया था। उन्होंने अन्तःपुरकी स्त्रियों,
विभिन्न देशोंसे आये हुए राजाओं, तथा नाना स्थानोंसे पधारे हुए ब्राह्मणोंके रहनेके लिये भी
अनेकानेक उत्तम भवन बनवाये। उन सबका निर्माण कुन्तीकुमार भीमने शिल्पशास्त्रकी
विधिके अनुसार कराया था ॥ १४—१६ ॥
तथा सम्प्रेषयामास दूतान् नृपतिशासनात् ।
भीमसेनो महाबाहो राज्ञामक्लिष्टकर्मणाम् ॥ १७ ॥
महाबाहो! यह सब काम हो जानेपर भीमसेनने महाराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे अनायास
ही महान् पराक्रम कर दिखानेवाले विभिन्न राजाओंको निमन्त्रण देनेके लिये बहुत-से दूत
भेजे ॥ १७ ॥
ते प्रियार्थं कुरुपतेराययुर्नृपसत्तम ।
रत्नान्यनेकान्यादाय स्त्रियोऽश्वानायुधानि च ॥ १८ ॥
नृपश्रेष्ठ! निमन्त्रण पाकर वे सभी नरेश कुरुराज युधिष्ठिरका प्रिय करनेके लिये
अनेकानेक रत्न, स्त्रियाँ, घोड़े और भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र लेकर वहाँ उपस्थित
हुए ॥ १८ ॥
तेषां निविशतां तेषु शिबिरेषु महात्मनाम् ।
नर्दतः सागरस्येव दिवस्पृगभवत् स्वनः ॥ १९ ॥
वहाँ बने हुए विभिन्न शिविरोंमें प्रवेश करनेवाले महामनस्वी नरेशोंका जो कोलाहल
सुनायी पड़ता था, वह समुद्र की गम्भीर गर्जनाके समान सम्पूर्ण आकाशमें व्याप्त हो रहा
था ॥ १९ ॥
तेषामभ्यागतानां च स राजा कुरुवर्धनः ।
व्यादिदेशान्नपानानि शय्याश्चाप्यतिमानुषाः ॥ २० ॥
कुरुकुलकी वृद्धि करनेवाले राजा युधिष्ठिरने इन नवागत अतिथियोंका सत्कार करनेके
लिये अन्न-पान और अलौकिक शय्याओंका प्रबन्ध किया ॥ २० ॥
वाहनानां च विविधाः शालाः शालीक्षुगोरसैः ।
उपेता भरतश्रेष्ठो व्यादिदेश च धर्मराट् ॥ २१ ॥
भरतभूषण! धर्मराज युधिष्ठिरने उन राजाओंकी सवारियोंके लिये भी धान, ऊँख और
गोरससे भरे-पूरे घर दिये ॥ २१ ॥
तथा तस्मिन् महायज्ञे धर्मराजस्य धीमतः ।
समाजग्मुर्मुनिगणा बहवो ब्रह्मवादिनः ॥ २२ ॥