अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 361, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंयथा मे पुरुषाः प्राहुर्र्ये धनंजयसारिणः ॥ ७ ॥
'भीमसेन! तुम्हारे छोटे भाई अर्जुन घोड़ेके साथ आ रहे हैं, जैसा कि उनका समाचार
लानेके लिये गये जासूसोंने मुझे बताया है ॥ ७ ॥
उपस्थितश्च कालोऽयमभितो वर्तते हयः ।
माघी च पौर्णमासीयं मासः शेषो वृकोदर ॥ ८ ॥
'वृकोदर! इधर यज्ञ आरम्भ करनेका समय भी निकट आ गया है। घोड़ा भी पास ही
है। यह माघ-मासकी पूर्णिमा आ रही है, अब बीचमें केवल फाल्गुनका एक मास शेष
है ॥ ८ ॥
प्रस्थाप्यन्तां हि विद्वांसो ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
वाजिमेधार्थसिद्धयर्थं देशं पश्यन्तु यज्ञियम् ॥ ९ ॥
'अतः वेदके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंको भेजना चाहिये कि वे अश्वमेध-यज्ञकी सिद्धिके
लिये उपयुक्त स्थान देखें' ॥ ९ ॥
इत्युक्तः स तु तच्चक्रे भीमो नृपतिशासनम् ।
हृष्टः श्रुत्वा गुडाकेशमायान्तं पुरुषर्षभम् ॥ १० ॥
यह सुनकर भीमसेनने राजाकी आज्ञाका तुरंत पालन किया। वे पुरुषप्रवर अर्जुनका
आगमन सुनकर बहुत प्रसन्न थे ॥ १० ॥
ततो ययौ भीमसेनः प्राज्ञैः स्थपतिभिः सह ।
ब्राह्मणाग्रतः कृत्वा कुशलान् यज्ञकर्मणि ॥ ११ ॥
तत्पश्चात् भीमसेन यज्ञकर्ममें कुशल ब्राह्मणोंको आगे करके शिल्पकर्मके जानकार
कारीगरोंके साथ नगरसे बाहर गये ॥ ११ ॥
तं स शालचयं श्रीमत् सप्रतोलीसुघट्टितम् ।
मापयामास कौरव्यो यज्ञवाटं यथाविधि ॥ १२ ॥
उन्होंने शालवृक्षोंसे भरे हुए सुन्दर स्थान पसंद करके उसे चारों ओरसे नपवाया।
तत्पश्चात् कुरुनन्दन भीमने वहाँ उत्तम मार्गोंसे सुशोभित यज्ञभूमिका विधिपूर्वक निर्माण
कराया ॥ १२ ॥
प्रासादशतसम्बाधं मणिप्रवरकुट्टिमम् ।
कारयामास विधिवद्धेमरत्नविभूषितम् ॥ १३ ॥
उस भूमिमें सैकड़ों महल बनवाये गये, जिसके फर्शमें अच्छे-अच्छे रत्न जड़े हुए थे।
वह यज्ञशाला सोने और रत्नोंसे सजायी गयी थी और उसका निर्माण शास्त्रीय विधिके
अनुसार कराया गया था ॥ १३ ॥
स्तम्भान् कनकचित्रांश्च तोरणानि बृहन्ति च ।
यज्ञायतनदेशेषु दत्त्वा शुद्धं च काननम् ॥ १४ ॥
अन्तःपुराणां राज्ञां च नानादेशसमीयुषाम् ।