अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 313, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंवे अर्जुनसे अपने नाम, गोत्र और नाना प्रकारके कर्म बताते हुए उनपर बाणोंकी
बौछार करने लगे ॥ ६ ॥
ते किरन्तः शरव्रातान् वारणप्रतिवारणान् ।
रणे जयमभीप्सन्तः कौन्तेयं पर्यवारयन् ॥ ७ ॥
वे ऐसे बाणसमूहोंकी वर्षा करते थे, जो हाथियोंको भी आगे बढ़नेसे रोक देनेवाले थे।
उन्होंने रणभूमिमें विजयकी अभिलाषा रखकर कुन्तीकुमारको घेर लिया ॥ ७ ॥
ते समीक्ष्य च तं कृष्णमुग्रकर्माणमाहवे ।
सर्वे युयुधिरे वीरा रथस्थास्तं पदातिनम् ॥ ८ ॥
युद्धमें भयानक कर्म करनेवाले अर्जुनको पैदल देखकर वे सभी वीर रथपर आरूढ़ हो
उनके साथ युद्ध करने लगे ॥ ८ ॥
ते तमाजघ्निरे वीरं निवातकवचान्तकम् ।
संशप्तकनिहन्तारं हन्तारं सैन्धवस्य च ॥ ९ ॥
निवातकवचोंका विनाश, संशप्तकोंका संहार और जयद्रथका वध करनेवाले वीर
अर्जुनपर सैन्धवोंने सब ओरसे प्रहार आरम्भ कर दिया ॥ ९ ॥
ततो रथसहस्रेण हयानामयुतेन च ।
कोष्ठकीकृत्य बीभत्सुं प्रहृष्टमनसोऽभवन् ॥ १० ॥
एक हजार रथ और दस हजार घोड़ोंसे अर्जुनको घेरकर उन्हें कोष्ठबद्ध-सा करके वे
मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हो रहे थे ॥ १० ॥
तं स्मरन्तो वधं वीराः सिन्धुराजस्य चाहवे ।
जयद्रथस्य कौरव्य समरे सव्यसाचिना ॥ ११ ॥
कुरुनन्दन! कुरुक्षेत्रके समराङ्गणमें सव्यसाची अर्जुनके द्वारा जो सिंधुराज जयद्रथका
वध हुआ था, उसकी याद उन वीरोंको कभी भूलती नहीं थी ॥ ११ ॥
ततः पर्जन्यवत् सर्वे शरवृष्टीरवासृजन् ।
तैः कीर्णः शुशुभे पार्थो रविर्मेघान्तरे यथा ॥ १२ ॥
वे सब योद्धा मेघके समान अर्जुनपर बाणोंकी वर्षा करने लगे। उन बाणोंसे आच्छादित
होकर कुन्ती-नन्दन अर्जुन बादलोंमें छिपे हुए सूर्यकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ १२ ॥
स शरैः समवच्छन्नश्चकाशे पाण्डवर्षभः ।
पञ्जरान्तरसंचारी शकुन्त इव भारत ॥ १३ ॥
भरतनन्दन! बाणोंसे आच्छादित हुए पाण्डवप्रवर अर्जुन पींजड़ेके भीतर फुदकनेवाले
पक्षीकी भाँति जान पड़ते थे ॥ १३ ॥
ततो हाहाकृतं सर्वं कौन्तेये शरपीडिते ।
त्रैलोक्यमभवद् राजन् रविरासीच्च निष्प्रभः ॥ १४ ॥