अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 312, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तसप्ततितमोऽध्यायः
अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध
वैशम्पायन उवाच
(जित्वा प्रसाद्य राजानं भगदत्तसुतं तदा ।
विसृज्य याते तुरगे सैन्धवान् प्रति भारत ॥)
सैन्धवैरभवद् युद्धं ततस्तस्य किरीटिनः ।
हतशेषैर्महाराज हतानां च सुतैरपि ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतनन्दन! महाराज भगदत्तके पुत्र राजा वज्रदत्तको
पराजित और प्रसन्न करनेके पश्चात् उसे विदा करके जब अर्जुनका घोड़ा सिंधुदेशमें गया,
तब महाभारत-युद्धमें मरनेसे बचे हुए सिंधुदेशीय योद्धाओं तथा मारे गये राजाओंके पुत्रोंके
साथ किरीटधारी अर्जुनका घोर संग्राम हुआ ॥ १ ॥
तेऽवतीर्णमुपश्रुत्य विषयं श्वेतवाहनम् ।
प्रत्युद्ययुरमृष्यन्तो राजानः पाण्डवर्षभम् ॥ २ ॥
यज्ञके घोड़ेको और श्वेतवाहन अर्जुनको अपने राज्यके भीतर आया हुआ सुनकर वे
सिंधुदेशीय क्षत्रिय अमर्षमें भरकर उन पाण्डवप्रवर अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे
बढ़े ॥ २ ॥
अश्वं च तं परामृश्य विषयान्ते विषोपमाः ।
न भयं चक्रिरे पार्थाद् भीमसेनादनन्तरात् ॥ ३ ॥
वे विषके समान भयंकर क्षत्रिय अपने राज्यके भीतर आये हुए उस घोड़ेको पकड़कर
भीमसेनके छोटे भाई अर्जुनसे तनिक भी भयभीत नहीं हुए ॥ ३ ॥
तेऽविदूराद् धनुष्पाणिं यज्ञियस्य हयस्य च ।
बीभत्सुं प्रत्यपद्यन्त पदातिनमवस्थितम् ॥ ४ ॥
यज्ञसम्बन्धी घोड़ेसे थोड़ी ही दूरपर अर्जुन हाथमें धनुष लिये पैदल ही खड़े थे। वे सभी
क्षत्रिय उनके पास जा पहुँचे ॥ ४ ॥
ततस्ते तं महावीर्या राजानः पर्यवारयन् ।
जिगीषन्तो नरव्याघ्रं पूर्वं विनिकृता युधि ॥ ५ ॥
वे महापराक्रमी क्षत्रिय पहले युद्धमें अर्जुनसे परास्त हो चुके थे और अब उन पुरुषसिंह
पार्थको जीतना चाहते थे। अतः उन सबने उन्हें घेर लिया ॥ ५ ॥
ते नामान्यपि गोत्राणि कर्माणि विविधानि च ।
कीर्तयन्तस्तदा पार्थं शरवर्षैरवाकिरन् ॥ ६ ॥