अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 297, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंआये ॥ १० ॥
ततः शब्दो महाराज दिशः खं प्रति पूरयन् ।
बभूव प्रेक्षतां नृणां कुन्तीपुत्रं धनंजयम् ॥ ११ ॥
महाराज! उस समय कुन्तीपुत्र धनंजयका दर्शन करनेवाले लोगोंके मुखसे जो शब्द
निकलता था, वह सम्पूर्ण दिशाओं और आकाशमें गूँज रहा था ॥ ११ ॥
एष गच्छति कौन्तेय तुरगश्चैव दीप्तिमान् ।
यमन्वेति महाबाहुः संस्पृशन् धनुरुत्तमम् ॥ १२ ॥
(लोग कहते थे—) 'ये कुन्तीकुमार अर्जुन जा रहे हैं और वह दीप्तिमान् अश्व जा रहा
है, जिसके पीछे महाबाहु अर्जुन उत्तम धनुष धारण किये जा रहे हैं' ॥ १२ ॥
एवं शुश्राव वदतां गिरो जिष्णुरुदारधीः ।
स्वस्ति तेऽस्तु व्रजारिष्टं पुनश्चैहीति भारत ॥ १३ ॥
उदारबुद्धि अर्जुनने परस्पर वार्तालाप करते हुए लोगोंकी बातें इस प्रकार सुनीं
—'भारत! तुम्हारा कल्याण हो। तुम सुखसे जाओ और पुनः कुशलपूर्वक लौट
आओ' ॥ १३ ॥
अथापरे मनुष्येन्द्र पुरुषा वाक्यमब्रुवन् ।
नैनं पश्याम सम्मर्दे धनुरेतत् प्रदृश्यते ॥ १४ ॥
एतद्धि भीमनिर्ह्रादं विश्रुतं गाण्डिवं धनुः ।
स्वस्ति गच्छत्वरिष्टो वै पन्थानमकुतोभयम् ॥ १५ ॥
निवृत्तमेनं द्रक्ष्यामः पुनरेष्यति च ध्रुवम् ।
नरेन्द्र! दूसरे लोग ये बातें कहते थे—'इस भीड़में हम अर्जुनको तो नहीं देखते हैं; किंतु
उनका यह धनुष दिखायी देता है। यही वह भयंकर टंकार करनेवाला विख्यात गाण्डीव
धनुष है। अर्जुनकी यात्रा सकुशल हो। उन्हें मार्गमें कोई कष्ट न हो। ये निर्भय मार्गपर आगे
बढ़ते रहें। ये निश्चय ही कुशलपूर्वक लौटेंगे और उस समय हम फिर इनका दर्शन
करेंगे' ॥ १४-१५ १/२ ॥
एवमाद्या मनुष्याणां स्त्रीणां च भरतर्षभ ॥ १६ ॥
शुश्राव मधुरा वाचः पुनः पुनरुदारधीः ।
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार उदारबुद्धि अर्जुन स्त्रियों और पुरुषोंकी कही हुई मीठी-मीठी
बातें बारंबार सुनते थे ॥ १६ १/२ ॥
याज्ञवल्क्यस्य शिष्यश्च कुशलो यज्ञकर्मणि ॥ १७ ॥
प्रायात् पार्थेन सहितः शान्त्यर्थं वेदपारगः ।
याज्ञवल्क्य मुनिके एक विद्वान् शिष्य, जो यज्ञकर्ममें कुशल तथा वेदोंमें पारंगत थे,
विघ्नकी शान्तिके लिये अर्जुनके साथ गये ॥ १७ १/२ ॥
ब्राह्मणाश्च महीपाल बहवो वेदपारगाः ॥ १८ ॥