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सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 421 में से

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पृष्ठ 296

हयश्च हयमेधार्थं स्वयं स ब्रह्मवादिना ।
उत्सृष्टः शास्त्रविधिना व्यासेनामिततेजसा ॥ ३ ॥
अमिततेजस्वी ब्रह्मवादी व्यासजीने अश्वमेधयज्ञके लिये चुने गये अश्वको स्वयं ही
शास्त्रीय विधिके अनुसार छोड़ा ॥ ३ ॥
स राजा धर्मराड् राजन् दीक्षितो विबभौ तदा ।
हेममाली रुक्मकण्ठः प्रदीप्त इव पावकः ॥ ४ ॥
राजन्! यज्ञमें दीक्षित हुए धर्मराज राजा युधिष्ठिर सोनेकी माला और कण्ठमें सोनेकी
कण्ठी धारण किये प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ४ ॥
कृष्णाजिनी दण्डपाणिः क्षौमवासाः स धर्मजः ।
विबभौ द्युतिमान् भूयः प्रजापतिरिवाध्वरे ॥ ५ ॥
काला मृगचर्म, हाथमें दण्ड और रेशमी वस्त्र धारण किये धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर
अधिक कान्तिमान् हो यज्ञमण्डपमें प्रजापतिकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ५ ॥
तथैवास्यर्त्विजः सर्वे तुल्यवेषा विशाम्पते ।
बभूवुरर्जुनश्चापि प्रदीप्त इव पावकः ॥ ६ ॥
प्रजानाथ! उनके समस्त ऋत्विज् भी उन्हींके समान वेश-भूषा धारण किये सुशोभित
होते थे। अर्जुन भी प्रज्वलित अग्निके समान दीप्तिमान् हो रहे थे ॥ ६ ॥
श्वेताश्वः कृष्णसारं तं ससाराश्वं धनंजयः ।
विधिवत् पृथिवीपाल धर्मराजस्य शासनात् ॥ ७ ॥
भूपाल जनमेजय! श्वेत घोड़ेवाले अर्जुनने धर्मराजकी आज्ञासे उस यज्ञसम्बन्धी
अश्वका विधिपूर्वक अनुसरण किया ॥ ७ ॥
विक्षिपन् गाण्डिवं राजन् बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् ।
तमश्वं पृथिवीपाल मुदा युक्तः ससार च ॥ ८ ॥
पृथिवीपाल! राजन्! अर्जुनने अपने हाथोंमें गोधाके चमड़ेके बने दस्ताने पहन रखे थे।
वे गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए बड़ी प्रसन्नताके साथ अश्वके पीछे-पीछे जा रहे
थे ॥ ८ ॥
आकुमारं तदा राजन्नागमत् तत्पुरं विभो ।
द्रष्टुकामं कुरुश्रेष्ठं प्रयास्यन्तं धनंजयम् ॥ ९ ॥
जनमेजय! प्रभो! उस समय यात्रा करते हुए कुरुश्रेष्ठ अर्जुनको देखनेके लिये बच्चोंसे
लेकर बूढ़ोंतक सारा हस्तिनापुर वहाँ उमड़ आया था ॥ ९ ॥
तेषामन्योन्यसम्मर्दादूष्मेव समजायत ।
दिदृक्षूणां हयं तं च तं चैव हयसारिणम् ॥ १० ॥
यज्ञके घोड़े और उसके पीछे जानेवाले अर्जुनको देखनेकी इच्छासे लोगोंकी इतनी
भीड़ इकट्ठी हो गयी थी कि आपसकी धक्का-मुक्कीसे सबके बदनमें पसीने निकल