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सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 217, कुल 421 में से

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पृष्ठ 217

तां द्रक्ष्यति भवानद्य कस्मिंश्चिद् वननिर्झरे ।
षष्ठे काले न हि मया सा शक्या द्रष्टुमद्य वै ॥ १८ ॥
सौदासने कहा—ब्रह्मन्! उन्हें आज आप वनमें किसी झरनेके पास देखेंगे। यह
दिनका छठा भाग है (मैं आहारकी खोजमें हूँ), अतः इस समय मैं उनसे नहीं मिल
सकता ॥ १८ ॥
वैशम्पायन उवाच
उत्तङ्कस्तु तथोक्तः स जगाम भरतर्षभ ।
मदयन्तीं च दृष्ट्वा स ज्ञापयत् स्वप्रयोजनम् ॥ १९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतभूषण! राजाके ऐसा कहनेपर उत्तंक मुनि महारानी
मदयन्तीके पास गये और उनसे अपने आनेका प्रयोजन बतलाया ॥ १९ ॥
सौदासवचनं श्रुत्वा ततः सा पृथुलोचना ।
प्रत्युवाच महाबुद्धिमुत्तङ्कं जनमेजय ॥ २० ॥
जनमेजय! राजा सौदासका संदेश सुनकर विशाललोचना रानीने महाबुद्धिमान् उत्तंक
मुनिको इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ २० ॥
एवमेतद् वद ब्रह्मन् नानृतं वदसेऽनघ ।
अभिज्ञानं तु किंचित् त्वं समानयितुमर्हसि ॥ २१ ॥
'ब्रह्मन्! आप जो कहते हैं, वह ठीक है। अनघ! यद्यपि आप असत्य नहीं बोलते हैं,
तथापि आप महाराजके ही पाससे उन्हींका संदेश लेकर आये हैं, इस बातका कोई प्रमाण
आपको लाना चाहिये ॥ २१ ॥
इमे हि दिव्ये मणिकुण्डले मे
देवाश्च यक्षाश्च महर्षयश्च ।
तैस्तैरुपायैरपहर्तुकामा-
श्छिद्रेषु नित्यं परितर्कयन्ति ॥ २२ ॥
'मेरे ये दोनों मणिमय कुण्डल दिव्य हैं। देवता, यक्ष और महर्षि लोग नाना प्रकारके
उपायोंद्वारा इसे चुरा ले जानेकी इच्छा रखते हैं और इसके लिये सदा छिद्र ढूँढ़ते रहते
हैं ॥ २२ ॥
निक्षिप्तमेतद् भुवि पन्नगास्तु
रत्नं समासाद्य परामृशेयुः ।
यक्षास्तथोच्छिष्टधृतं सुराश्च
निद्रावशाद् वा परिधर्षयेयुः ॥ २३ ॥
'यदि इन कुण्डलोंको पृथ्वीपर रख दिया जाय तो नाग लोग इसे हड़प लेंगे। अपवित्र
अवस्थामें इन्हें धारण करनेपर यक्ष उड़ा ले जायँगे और यदि इन्हें पहनकर नींद लेने लग