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सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 421 में से

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पृष्ठ 216

सोऽहं त्वामनुसम्प्राप्तो भिक्षितुं मणिकुण्डले ॥ १२ ॥
उत्तंकने कहा—पुरुषप्रवर! आपका दिया हुआ दान मैं सदा ही ग्रहण करनेके योग्य
मानता हूँ। इस समय मैं आपकी रानीके दोनों मणिमय कुण्डल माँगनेके लिये यहाँ आया
हूँ ॥ १२ ॥
सौदास उवाच
पत्न्यास्ते मम विप्रर्षे उचिते मणिकुण्डले ।
वरयार्थं त्वमन्यं वै तं ते दास्यामि सुव्रत ॥ १३ ॥
सौदासने कहा—ब्रह्मर्षे! वे मणिमय कुण्डल तो मेरी रानीके ही योग्य हैं। सुव्रत! आप
और कोई वस्तु माँगिये, उसे मैं आपको अवश्य दे दूँगा ॥ १३ ॥
उत्तङ्क उवाच
अलं ते व्यपदेशेन प्रमाणा यदि ते वयम् ।
प्रयच्छ कुण्डले मह्यं सत्यवाग् भव पार्थिव ॥ १४ ॥
उत्तंकने कहा—पृथ्वीनाथ! अब बहाना करना व्यर्थ है। यदि आप मुझपर विश्वास
करते हैं तो वे दोनों मणिमय कुण्डल आप मुझे दे दें और सत्यवादी बनें ॥ १४ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तस्त्वब्रवीद् राजा तमुत्तङ्कं पुनर्वचः ।
गच्छ मद्द्वचनाद् देवीं ब्रूहि देहीति सत्तम ॥ १५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! उनके ऐसा कहनेपर राजा फिर उत्तंकसे बोले
—‘साधुशिरोमणे! आप रानीके पास जाइये और मेरी आज्ञा सुनाकर कहिये। आप मुझे
कुण्डल दे दें ॥ १५ ॥
सैवमुक्ता त्वया नूनं मद्वाक्येन शुचिव्रता ।
प्रदास्यति द्विजश्रेष्ठ कुण्डले ते न संशयः ॥ १६ ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! रानी उत्तम व्रतका पालन करनेवाली हैं। जब आप उनसे इस प्रकार कहेंगे,
तब वे मेरी आज्ञा मानकर दोनों कुण्डल आपको दे देंगी, इसमें संशय नहीं है’ ॥
उत्तङ्क उवाच
क्व पत्नी भवतः शक्या मया द्रष्टुं नरेश्वर ।
स्वयं वापि भवान् पत्नीं किमर्थं नोपसर्पति ॥ १७ ॥
उत्तंक बोले—नरेश्वर! मैं कहाँ आपकी पत्नीको ढूँढ़ता फिरूँगा? मुझे क्योंकर उनका
दर्शन हो सकेगा? आप स्वयं ही अपनी पत्नीके पास क्यों नहीं चलते? ॥
सौदास उवाच