श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 556, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें५४० आनन्दरामायणे [ सर्गः १३
ततो निवेदयामास तद्वृत्तं राघवाय सः । तच्छ्रुत्वा राघवोऽप्यासीद्विस्मयाविष्टमानसः ॥३३॥
सुहृज्जनैर्युतं बन्धुं लक्ष्मणं प्रेष्य पार्थिवान् । स्वपुरीमानयामास ते नेमु रघूनायकम् ॥३४॥
ततस्ते नृपशुः सदसि सेनात्तृत्तं न्यवेदयन् । रामोऽपि कथयामास स्वसेनात्तृत्तमादरात् ॥३५॥
तदा विहस्य श्रीरामः समाहूय निजं गुरुम् । पृष्टवान्मम सैन्यानि नृपाणां चापि वै गुरो ॥३६॥
किं जातानि क्व वै सन्ति तद्वदस्व सविस्तरम् । तद्रामवचनं श्रुत्वा कृत्वा ध्यानं क्षणं गुरुः ॥३७॥
तदा प्राह महामन्त्री विहस्य रघुनन्दनम् । राम राम महाबाहो सर्वं वेत्सि त्वमेव हि ॥३८॥
यदि पृच्छसि मां राम तर्हि सर्वं वदाम्यहम् । शतकोटिमितं रामचरितं तव पावनम् ॥३९॥
वाल्मीकिना कृतं पूर्वं तन्मध्ये रघुनन्दन । आनन्दरामचरितं नवकाण्डसमन्वितम् ॥४०॥
तस्य श्रवणपाठाद्यैः सर्वसैन्येषु ये नराः । ते गतास्त्वत्पदं केचित्केचित्श्लोकोक्तरादिषु ॥४१॥
न संति भुवि सैन्यानि सत्यं राम वचो मम । नवकाण्डमितं तच्च रम्यमानन्ददायकम् ॥४२॥
तस्यैकश्रवणादिद्धि फलं रघुकुलोद्भव । येन ते हीनजातित्वा दृप्ताश्च मुक्तिगामिनः ॥४३॥
सारकाण्डश्रवादेव संसारात्मुच्यते नरः । यात्राकाण्डेन यात्राणां लभ्यते मानवैः फलम् ॥४४॥
यागकाण्डेन यज्ञानां लभ्यते फलमुत्तमम् । विलासकाण्डश्रवणादप्सरोभिर्नमोदने ॥४५॥
जन्मकाण्डेन चाप्नोति नरः पुत्रादिमंततिम् । विवाहकाण्डश्रवणाद्भुवि रम्यां स्त्रियं लभेत् ॥४६॥
राज्यकाण्डेन राज्यं हि मानवैर्रुवि लभ्यते । कांडं मनोहर श्रुत्वा लभ्यते मानसेप्सितम् ॥४७॥
पूर्णकाण्डश्रवाद्देव [त्तै] पूर्णस्य पदं लभेत् । सर्वं तान्मानवैः श्रुत्वाऽऽनन्दरामायणं भुवि । ४८।
सच्चिदानन्दरूपे ते लीनो भवति मानवः । एवं राम त्वया पृष्टं तन्मयं कथित मया ॥४९॥
यदग्रेऽद्य चिकीर्षा ते तत्कुरुष्व रघूत्तम । इति रामं वसिष्ठस्तु यावत्प्राह नृपाग्रतः ॥५०॥
उन्होंने राजाओंकी अगवानी करनेके लिए सेना बुलवायी तो उन्हं भी सेना नहीं मिली ॥ ३२ ॥ लक्ष्मणने रामको यह वृत्तान्त सुनाया तो राम भी चौंक से रह गये ॥ ३३ ॥ अन्तमें रामने भी अपने परिवारके लोगोंको भेजकर राजाओंकी आगवानी करायी । राजाओंने अपनी-अपनी सेनाका समाचार सुनाया । सो सुनकर रामने आदरपूर्वक अपना सा सब हाल कहा ॥ ३४ । ३५ ॥ तदनन्तर रामने अपने कुलगुरु वसिष्ठको बुलवाया और हंसकर उनसे कहा हे गुरो ! हमारा तथा इन राजाओंकी सेना कहाँ चली गयी है, सो विस्तारपूर्वक बतलाइए । रामकी बात सुनकर वसिष्ठने कहा-हे राम ! हे महाबाहो ! आप स्वयं सब बातोंको जानते हैं ॥ ३६-३८ । फिर भी यदि मुझसे पूछ रहे हैं तो बतलाता हूँ बहुत दिनों पहले महर्षि वाल्मीकिने सौ करोड़ श्लोकोंमें आपके पावन चरितका वर्णन किया था । उसके मध्यम नौ काण्डोंका आनन्दरामायण है ॥ ३६ ॥ ४० ॥ उसका श्रवण तथा पाठ करनेसे आपकी सेनाके सारे सैनिकोंमेसे कुछ तो आपके परमपद (वैकुण्ठ) को और कुछ अन्यान्य लोकोंको चले गये हैं ॥ ४१ ॥ हे राम ! आप मेरी इस बातको सच मानिए । इस समय संसारमें कोई भी सेना नहीं है। नौ काण्डोंवाला आनन्ददायक एवं रमणीक वह आनन्दरामायण है ॥ ४२ ॥ उसका श्रवण करनेसे नीच जातिकाले लोग भी मुक्तिपद प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४३ ॥ सारकाण्डके श्रवणसे प्राणी संसारसे मुक्त हो जाता है। यात्राकाण्डके श्रवणसे तीर्थोंकी यात्राका पुण्य प्राप्त होता है ॥ ४४ ॥ यागकाण्डसे यज्ञोंका शुभ फल प्राप्त होता है । विलासकाण्डके श्रवणसे प्राणी स्वर्गकी अप्सराओंके साथ आनन्द करता है ॥ ४५ ॥ जन्म-काण्डके श्रवणसे पुत्रादि सन्तति पाता है । विवाहकाण्डको सुननेसे मनुष्य संसारमें सुन्दरी स्त्री पाता है ॥ ४६ ॥ राज्यकाण्डके सुननेसे प्राणी राज्यपद पाता है और मनोहरकाण्डके सुननेसे अपनी अभिलाषाके अनुसार सब वस्तुयें पा जाता है ॥ ४७ ॥ पूर्णकाण्डके श्रवणसे पूर्णपद प्राप्त होता है और समस्त आनन्दरामायण श्रवण करके मनुष्य सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मामे लीन हो जाता है । हे राम ! आपने मुझसे जो पूछा, सो सब मैंने