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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

माड़ौका युद्ध । ८३ ३५
हरवा देखत लाखापातुरि तुरतै हाल गई सब जानि ॥
ईतो लड़का हैं द्यावलि के अपनो वदन छिपायो आनि ६४
किह्यो इशारा अस योगिनको ज्यहिमाँ चले बेगिही जायँ ॥
जो कहुँ जानी जम्बै राजा तुरतै डारी इन्हें मराय ६५
जानि इशारा को योगी गे तुरतै ब्वला लहुरवा भाय ॥
बारह बरसैं तुमका हइगें अब हम मोहबा देव दिखाय ६६
बिदा मांगिकै महराजा सों योगी चले तुरतही धाय ॥
योगी पहुँचे पचपेड़न तर लाखा लीन्ह्यो हार छिपाय ६७
उड़ा दुपट्टा जब बायू सों चमकन लाग नौलखा हार ॥
चमकत दीख्यो त्यहि हरवाको राजा माड़ो का सरदार ६८
जम्बै बोलै तब लाखा ते सांचे हाल देव बतलाय ॥
हरवा दीन्ह्यो को तुम को है हमरे धीर धरा ना जाय ६६
हाथ जोरिकै लाखा बोली यह तकसीर माफ़ ह्वैजाय ॥
राह चलन्ते योगी आये हम को हार गये पहिराय १००
इतना सुनिकै राजा जम्बा तुरतै गयो सनाकाखाय ॥
करिया बेटा ते बोलत भा अब तुम रंगमहलको जाय १०१
हार नौलखा मोहबे वाला सो मोहिं बेगि दिखावै आय ॥
इतना सुनिकै करिया चलिभा पहुँचा रंगमहल में जाय १०२
आवत दीख्यो जब करिया को कुशला मिली तुरतही आय ॥
कौन काम को तुम आये हौ करिया हमैं देउ बतलाय १०३
हार मँगाय देउ मोहबे का राजै तुरत दिखावैं जाय ॥
लरी टूटिगय त्यहि हरवा कै सो पटवा घर दीन पठाय १०४
टूट्यो टाटो जस कछु होवै तस तुम हमें देव मँगवाय ॥
थर थर कांपी महरानी तब बोली कछू कही ना जाय १०५