आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 85, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ आल्हखण्ड । ८०
बात हमारी पै भूल्यो ना साँचिकिह्यो उदयसिंहराय ५६
बिना बियाहे तुमका जावैं हमका लौटि भगौती खायँ ॥
आल्हा देखें ह्याँ गलियनमा कहूं न दीख लघुरवा भाय ६०
ठाढ़े सोचन आल्हा लागे मनमा बारबार पछिताय ॥
मुख दिखलैहौं कस मल्हनाको राजै काह सुनैहौं जाय ६१
द्यावलि माता जो सुनि पैहैं तौ मरिभायँ पुत्र के घाय ॥
सिढ़ियन सिढ़ियन ते नीचे है ऊदन तुरत पहुँचे आय ६२
देखिकै ऊदन को आल्हा ने तुरतै छाती लीन लगाय ॥
देर लगाई कहँ भाई तुम सो मोहिं हाल देबबतलाय ६३
सुनिकै बातें ये आल्हा की बोले उदयसिंह बलवान ॥
ब्यटीबिजैसिनि रनिकुशलाकी सो वह हमें गई पहिंचान ६४
ब्याह हमारे सँगमा कीन्ह्यो हमते कसम लीन करवाय ॥
हाल बतायो सब माड़ो का दादा सत्य दीन बतलाय ६५
सुनिकै बातें ये ऊदन की आल्हा बोले वचन रिसाय ॥
ब्याह न करिहैं हम वैरी घर मानो कही उदयसिंहराय ६६
जब सुधिकरिहैं निजघर केरी स्वावत हनै त्वरे तलवारि ॥
मरे केकई सों दशरथ हैं अजहूं करें दुर्दशा नारि ६७
इतनी सुनिकै मलखे बोले दादा मानो कही हमार ॥
पहिले बदला लेउ बाप को पाछे फेरि किह्यो तकरार ६८
इतनी सुनिकै पांचो चलिभे लोहागढ़ पहुँचे आय ॥
देखिकै फाटक लोहागढ़ को आल्हासोचिसोचिरहिजायँ ६६
कठिन मवासी गढ़माड़ो है कैसे मिलै बाप का दायँ ॥
बातें सुनिकै ये आल्हा की बोले तुरत बनाफरराय ७०
कृपा जो होई नारायण की तौ मिलि जई बापका दायँ ॥