आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबेलाताहरकामैदान । ५७७ १३
आगा सुनिकै बेला बोली बहिनि साँचदेयँ बतलाय १२६
हम तो रण्डा वादिन जाना जादिन मरे बीर मलखान ॥
कीरति पायो जग मण्डल में तुमको सत्तदीन भगवान १३०
करि परिकरमा फिरि चौराकी पलकी चढ़ी तड़ाकाधायै ॥
दावे लश्कर को आवति भै मनमें श्रीगणेशपदध्याय १३१
पहर अढ़ाई के अर्सामा डोला गयो फौजमें आय ॥
यह अलबेला बेला रानी प्रीतम पास पहुँचीजाय १३२
देख्यो बेला को ब्रह्मानँद आयसु तुरत दीन फरमाय ॥
मोरि लालसा यह इवालतिहै ताहरशीशदिखावोआय १३३
सुनिकै बातें ये प्रीतम की दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
बेला बोली फिरि प्रीतम ते आपन बस्त्र देउमँगवाय १३४
यामें संशय कछु नाहींहै ताहर शीश दिखाउब आय ॥
धीरज राखो अपने मनमाँ अब मैं जात तड़ाकाधाय १३५
सुनिकै बातें ये बेला की सब सामान दीन मँगवाय ॥
भइ मर्दाना बेला रानी शोभा कही बून ना जाय १३६
झीलम बख्तर बेला पहिरी शिरपर धरी बैजनी पाग ॥
को गति बरणै तहँ बेला कै मुखमेंसबै तिलनके दाग १३७
छुरी कटारी बेला बाँधी कम्मर कसी एकतलवार ॥
भाला बरछी लै हाथे मा हरनागर पर भई सवार १३८
बाजे डंका अहलंका के फौजें सबै भई तय्यार ॥
घोड़ बेंदुला का चढ़वैया नाहर उदयसिंह सरदार १३६
त्यही समैया त्यहि औसर मा बेला पास पहुँचा आय ॥
ऊदन बोले तहँ बेलाते हमको लेवो साथ लिवाय १४०
सुनिकै बातें ये ऊदनकी बेला बोली बचन उदार ॥
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