आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ आल्हखण्ड । ५७६
जन्म अकारथ यहु दुनियामाँ कौनीभाँति काटिहौं माय ११७
नैनन योवन औ बैनन को नहिं कछु पूरभयो व्यवहार ॥
अंग न पर्शा हम प्रीतम का ना पद पूर भयो भर्त्तार ११८
सदा अभागी नर नारिन को नाहक रचा नही कर्त्तार ॥
कर्म शुभाशुभ जो लाग्यो है सोई भोगि रहा संसार ११९
यहै सोचिकै मन अपने मा आयसु देउ तड़ाका माय ॥
समय किफायत गाथा भारी आरी कहे जान है जाय १२०
इतना सुनतै मल्हना रानी मनमा बार बार पछिताय ॥
दुःख विधाता हमका दीन्ह्यो गाथा कही कहाँलगजाय १२१
इतना सोचत मन अपने मा आयसु फेरि दीन हर्षाय ॥
चरण लागिकै महरानी के बेला कूच दीन करवाय १२२
संग धनाफर आल्हा ठाकुर पलकी चली तड़ाका धाय ॥
बेला बोली तहँ आल्हा ते साँची सुनो बनाफरराय १२३
दखौं चौतरा गजमोतिनि का यह मन गई लालसा छाय ॥
इतना सुनतै आल्हा ठाकुर सिरसा चले तड़ाकाधाय १२४
जहाँ चौतरा गजमोतिनि का डोला तहाँ दीन धरवाय ॥
उतरिकै डोला ते बेला तब चन्दन अक्षत फूलमँगाय १२५
कीन चबुतरा की पूजा भल मन में बार बार तहँ ध्याय ॥
सतीशिरोमणिगजमोतिनिजो साँचे शूर बनाफरराय १२६
आभा बोलै तौ चौराते ज्यहि संतोष मोहिं है जाय ॥
बोली आभा गजमोतिनि की माहिल डारे कन्त मराय १२७
सत्त विधाता मोको दीन्ह्यो सत्ती भयूँ यहां पर आय ॥
तीनि महीना सत्रह दिनमा सब महनामथ जायपटाय १२८
दिल्ली मोहबा द्वउ शहरन में राँड़ै राँड़ै परै दिखाय ॥