आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतब समुझावै मलहना रानी बहुवर शोक देउ बिसराय ८१
पारस पत्थर घर तुम्हरेमा बहुवर बैठिकरो तुम राज ॥
हुकुम तुम्हारो रैयति मानी द्वैहैं सबै धर्म के काज ८२
द्यावलि बोली फिरि बेला ते रानी बचन करो परमान ॥
धर्म सनातन को याही है राखै सासु श्वशुरको मान ८३
इतना सुनिकै बेला बोली यहु दुख दून तुम्हारो दीन ॥
घर बैठार्यो दोउ पुत्रन को मोहबा बंशनाश तुम कीन ८४
इतना सुनिकै द्यावलि बोली साँची मानो कही हमार ॥
यह सब करतब है माहिल कै जिनके चुगुलिनका बैपार ८५
सवन चिरैया ना घर छोड़ै ना बनिजरा बनिजको जाय ॥
चुगुली करिकै माहिलठाकुर मोको तुरत दीन निकराय ८६
गे जगनायक जब कनउजका आवैं नहीं बनाफरराय ॥
मैं समुझायों दुउ भाइन का लाये संग कनौजीराय ८७
घाटबयालिस तेरह घाटी सब रुकववा पिथौराराय ॥
जीति पिथौरा को लखराना सबियाँ लीन्हे घाट छँड़ाय ८८
पान धरायो जब गौने का तब नहिं बीरा कऊ चबाय ॥
बीरा लीन्ह्यो जब ऊदन ने ब्रह्मा लीन्ह्यो तुरत छँड़ाय ८६
यह सब करतब है माहिल कै डार्यनि वंशनाश करवाय ॥
काल नगीचे ज्यहि के आवै त्यहिकै देवै बुद्धि नशाय ९०
इतना कहतै तहँ द्यावलि के आल्हा गये तड़ाकाआय ॥
बेला बोली तहँ आल्हा ते कीरतिसागर लयो दिखाय ९१
यह मन भाई सब रानिनके पलकी चढ़ीं तड़ाकाधाय ॥
चलीं पालकी महरानिन की संगै चले बनाफरराय ६२
कीरतिसागर फिरि आई सब नौका पास लीन मँगवाय ॥