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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 573, कुल 618 में से

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पृष्ठ 573

[Header] ८ आल्हखण्ड । ५७२

कोकिल हंस मोर पारावत तीतर लवा सुवा सुखदाय ६९
शोभा देखत तहँ छज्जा की बेला बार बार पछिताय ॥
जीवत प्रीतम हमरे होते तौ सुखभोग होत अधिकाय ७०
आज काल्ह दिन प्रीतम भेलैं ताते नरक सरिस दिखलाय ॥
हाय ! विधाताकी मरजी अस भारी विपति गई शिर आय ७१
प्रीतम प्यारे के सतखण्डा हम पर फाटि गिरो अरराय ॥
यह मन विनवत बेला रानी महलन गई तड़ाका आय ७२
बेला बोली फिरि मल्हनाते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
मोरि लालसा यह डोलति है चन्दन वगिया देउ दिखाय ७३
सुनिकै बातें ये बेला की पालकी तुरत लीन मँगवाय ॥
बैठि पालकी महरानी सब चन्दन बाग पहुँचिं जाय ७४
पुष्पवाटिका तहँ राजत है छाजत सबै दिनन ऋतुराज ॥
बेला चमेली औ नेवारकी पंक्तीं रहीं एक दिशि छाज ७५
बिसुनकान्ता कहुँ कहुँ फूले कहुँ कहुँ फूले सुर्ख अनार ॥
श्वेत रक्त औ मधुर गुलाबी पाटल फूले भांति अपार ७६
फुली चांदनी श्वेत वरणहैं जिन पर केलि करत बहुभृंग ॥
को गति वरणै दुपहरिया कै ज्यहिको रक्तवरण है रंग ७७
श्वेत रक्त औ मधुर गुलाबी सब विधि फूलि रहा करवीर ॥
कदली केंवँड़ा यकदिशि राजत छूटत देखि मुनिनको धीर ७८
श्वेत रक्त तहँ चन्दन छाजैं राजैं कोकिल मोर चकोर ॥
पीव पपीहा की रट सुनिकै बिरहिनि पीर होय अतिघोर ७६
यह सुख सम्पति बेला लखिकै कीन्ह्यो घोर शोर चिग्घार ॥
जितनी रानी थीं वगिया में सबहिन छांड़िदीन डिंडकार ८०
मोती ऐसे आँसू ढरकें बेला हृदय शोक गा छाय ॥