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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 569

४ आल्हखण्ड । ५६८


बाजत डंका अहलंका के पहुँचा नार उपरसो आय २१
दीख्यो आल्हा को चौंडाने गरुई हाँक कहा गुहराय ॥
डोला धरिकै अब बेला का जावो लौटि बनाफरराय २२
हुकुम पिथौरा का याही है आल्हा साँच दीन बतलाय ॥
सुनिकै बातें ये चौंड़ा की बोला फेरि बनाफरराय २३
डोला लौटनको नाहीं है चौंड़ा काह गये बौराय ॥
एक पिथौरा की गिन्ती ना लाखन चढ़ैं पिथौरा आय २४
नगर मोहोवे डोला जाई चौंड़ा साँच दीन बतलाय ॥
गा हरिकारा फिरि तहँना ते जहँना बैठ बनाफरराय २५
डोला घेरा है बेला का बोला हाथ जोरि शिरनाय ॥
इतना सुनिकै ऊदन ठाकुर तुरतै कूच दीन करवाय २६
जहँ पर फौजैं हैं चौंड़ा की पहुँचा तुरत लहुरवाभाय ॥
हाथ जोरिकै ऊदन बोले दादा कूच जाउ करवाय २७
इतना सुनिकै चौंड़ा बक्शी तुरतै हुकुम दीन फर्माय ॥
जान न पावैं मोहवे वाले सब के देवो मूड़गिराय २८
हुकुम चौंड़िया का पावतखन क्षत्रिन खैंचि लीन तलवार ॥
झुके सिपाही दुहुँ तरफा के लागी होन भड़ाभड़ मार २९
गोली ओला सम बरसी तहँ कोताखानी चलीं कटार ॥
भा खलभल्ला औ हल्ला अति जूझन लागि शूर सरदार ३०
कटि कटि कल्ला गिरैं बछेड़ा घूमैं मूड़ बिना असवार ॥
खट खट खट खट तेगा बोलैं बोलैं छपक छपक तलवार ३१
झल् झल् झल् झल् झीलमझलकें नीलम रंग परै दिखलाय ॥
चम् चम् चम् चम् छूरीचमकैं कउँधालपकनिखङ्गदिखाय ३२
मर् मर् मर् मर् दालैंच्वालैं तेगा टन्र टन्र टन्राय ॥