आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबेलाताहरकामैदान । ५६७ ३
घाव करेजे का तब पूरे औ सुख सम्पति मोहिं सुहाय ६
इतना सुनिकै बेला बोली स्वामी बचन करो परमान ॥
कपड़ा घोड़ा दै कोड़ा निज पठवो मोहिं समर मैदान १०
एक लालसा पै डोलति है स्वामी पूरिकरो यहि काल ॥
नगर महोबा मोहिं पठवावो दर्शन करों सासुके हाल ११
इतना सुनिकै ब्रह्मा बोले जावो साथ लहुरवाभाय ॥
बेला बोली तब स्वामी ते यहनहिंउचितमोहिंदिखलाय १२
ब्रह्मा बोले फिरि लाखनि ते तुमहीं जाउ कनौजीराय ॥
बेला बोली फिरि स्वामी ते यहनहिंउचितमोहिंदिखलाय १३
बदला लैहैं संयोगिनि का रखिहैं मोहिं कनौजे जाय ॥
दुई हँसौवा दुहुँ तरफा का प्रीतम करिहौ कौन उपाय १४
ब्रह्मा बोले फिरि आल्हा ते तुम चलिजाउ बनाफरराय ॥
यह मन भाई तब बेला के पलकी चढ़ी तड़ाकाधाय १५
चढ़ि पचशब्दा हाथी ऊपर अल्हा ठाकुर भये तयार ॥
डोला चलिभा फिरि बेला का संगै चले बहुत असवार १६
यह गति देखी माहिल ठाकुर लिल्ही उपर भये असवार ॥
जहाँ पर बैठे पृथीराज हैं पहुँचा उरई का सरदार १७
बड़ी खातिरी राजा कीन्ह्यो अपने पास लीन बैठाय ॥
जो कछु गाथा थी तम्बू की माहिल यथानथ्य गा गाय १८
तब महराजा दिल्लीवाला चौंडे तुरत लीन बुलवाय ॥
खबरि सुनाई सब चौंड़ा को जो कछु माहिल दीन बताय १६
नार कँकरिहा पर तुम घेरो डोला लावो बेगि छिनाय ॥
हुकुम पायकै महराजा को फौजें तुरत लीन सजवाय २०
चढ़ि इकदन्ता हाथी ऊपर चौंड़ा कूचदीन करवाय ॥