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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 559

१६ आल्हाखण्ड । ५५८
घोड़ बेंदुला की पीठौ मा ठाकुर उदयसिंह सरदार १६५
मोर्चाबन्दी भै दूनों मा दूनों लड़ैलागि त्याहिकाल ॥
अभिरै क्षत्री अरझारा सों भिड़िगैतहाँ ढाल में ढाल १६६
धाँधू धनुवाँ का मोर्चा भा सय्यदनृपतिग्वालियरक्यार ॥
को गति बरणै रजपूतन कै मारैं दऊ हाथ तलवार १६७
जैसे भेड़िन भेड़हा बैठै जैसे अहिर विडारै गाय ॥
तैसे मारै ताहर नाहर शूरन दीन्ह्यो समर वराय १६८
धाँधू धमकै तहँ तेगा को चमकै चमाचम्म तलवार ॥
अली अली कहि सय्यद दौरै रणमाहोतजातगलियार १६६
बड़ा लड़ैया अंगद राजा गोरै ढूँढ़ि ढूँढ़ि सरदार ॥
मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार १७०
सवैया ॥
करहत शूर गिरैं रणखेतन पूरि रही ध्वनि गारु अपारा ।
मत्त मतंग गिरैं भहराय सो हाय दयी यह होत पुकारा ॥
छूटत तीर सो पूरि रहे तन धूरि उड़ै नहिं कीच अपारा ।
मीच भई रणशूरन की ललिते मन कायर जात दरारा १७१
कायर भागि चले ललिते अकुलात महामन दुःख न छाये ।
मोद बढ़यो रणशूरन के बलपूरन के कछु दुःख न आये ॥
कूर कुपूत रहे रजपूत ते मूत भये रण नाम घराये ॥
पूत सपूत महामजबूत सो वूतलड़ै नहिं पाउँ डिगाये १७२
घड़ी लड़ाई भै मारग में पिरथी लाखनि के मैदान ॥
मारे मारे तलवारिन के गिरिगे बड़ेसुघरवाज्वान १७३
मान न रहिगे क्यहु क्षत्रिनके सब के छूटिगये अभिमान ॥