आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबेलाकेगौनेकाद्वितीययुद्ध । ५५३ ११
दायज दीन्ह्यों परिमालिक को कुण्डल यहाँ दीन रखवाय १०५
इतनी सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
राजा नौकर की समता ना बैठैं कौन भाँति से आय १०६
नोक लगायो फिरि भाला की कुण्डल दोऊ लीन उठाय ॥
सजग देखिकै फिरि क्षत्रिनको घोड़ा तुरत दीन दौराय १०७
बेला पहुँची जब महलन मा माता लीन्ह्यो कण्ठ लगाय ॥
भल समझायो रानी अगमा बेटी शोक देउ बिसराय १०८
लिखी विधाता की मेटै को कीन्ह्यों घाटि चौंड़ियाराय ॥
दुलहिनि बोली तब ताहर की ननदी रोवै तोरि बलाय १०९
ब्याह तुम्हारो कहुँ अनतै अब करिहैं श्वशुर पिथौराराय ॥
राजपाट सब तुम्हरे घरमा दौलतभरी पुरीअधिकाय ११०
संग न कीन्ह्यो ननदोई का ननदी रोवै तोरिबिलाय ॥
ब्याह न अनुचित कछु दूसरहै ननदी काह गयी बौराय १११
मरे चँदेले मरि जावैदे ननदी रोवै तोरि बलाय ॥
सुनिकै बातें ये भौजीकी बेला बोली क्रोध बढ़ाय ११२
उचित न बातें कछु तेरी हैं अनुचित बात रही बतलाय ॥
भाँवरि फिरिकै चंदेले सँग करिब्योब्याह औरसँगजाय ११३
कउने गवाँरे की बिटियाहै ऐसी टेढ़ि मेढ़ि बतलाय ॥
नहिं सुखस्वइहै तुइ महलन में डरिहौं अवशि राँड़ करवाय ११४
राँड़ अभागिनि की बातें सुनि भौजी चुप्प साधि रहिजाय ॥
तब तो बेला अलबेला यह भूषणवस्त्र सजे अधिकाय ११५
रूप उजागरि सबगुणआगरि शोभा कही बून ना जाय ॥
कटि लचकीली सो मटकीली पीली दुःख देह दिखलाय ११६
माँग सँवारी सो सुकुमारी मानो इन्द्रधनुष समुदाय ॥