आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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कीन प्रतिज्ञा हम कुड़हरिमां लौटति नगर ल्याब लुटवाय ॥
साँची करिये यहि समया मा मानो कही बनाफरराय २५६
इतना सुनिकै ऊदन जरिगे तुरतै हुकुम दीन फरमाय ॥
लागैं तोपैं अब कुड़हरि मा सबियाँगर्द देउ मिलवाय २६०
इतना सुनिकै लाखनि बोले मानो कही बनाफरराय ॥
गंगाधर कुड़हरि का राजा मामा सगो हमारो आय २६१
लिखिकै चिट्ठी दै धावन को उनको खबरि देउ करवाय ॥
मैने तुम्हरे लाखनि आये कोड़ा आपु देउ पठवाय २६२
सुनिकै बातें लखराना की चिट्ठी लिखा बनाफरराय ॥
तुरतै धावन को बुलवायो औ कुड़हरिको दीनपठाय २६३
लैके चिट्ठी धावन चलिभा औ दरबार पहुँचाजाय ॥
चिट्ठी दीन्ह्यो गंगाधर को धावन हाथजोरिशिर नाय २६४
कही हकीकति सब गंगा ते जो कछु कह्यो बनाफरराय ॥
सुनि संदेशा पढ़ि चिट्ठी को ठाकुरक्रोधकीनअधिकाय २६५
तुरत नगड़ची को बुलवायो डङ्का दीन तहाँ बजवाय ॥
कह्यो सँदेशा फिरि धावन ते आल्है खबरि जनावोजाय २६६
राजा आवत समरभूमि में कोड़ा लेउ तहाँ पर आय ॥
इतना सुनिकै धावन चलिभा आल्है खबरि बताईजाय २६७
बाजे डङ्का ह्याँ कुड़हरि मा क्षत्री होन लागि तय्यार ॥
हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार २६८
झीलम बख्तर पहिरि सिपाहिन हाथ म लई ढाल तलवार ॥
रणकी मौहरि बाजन लागी रणकाहोनलागब्यवहार २६६
चढ़िकै हथिनी गंगा ठाकुर तुरतै कूच दीन करवाय ॥
चारि घरी का अरसा गुजरा पहुँचे समरभूमिमाआय २७०