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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 479

१६ आल्हखण्ड । ४७५
जबै मोहोबे को तुम चलिहौ चलिबे साथ बनाफरराय ॥
आजु साँकरा परिमालिक पर औ चढ़िआवा पिथौराराय १६५
संगै जैबे हम ऊदन के करिबे जूझ तहाँपर जाय ॥
जो मरिजबै समरभूमि मा तौ यशरही लोकमाछाय १६६
जो बचि अइबे हम मोहबे ते रानी संग करब फिरि आय ॥
सुनिकै बातें लखराना की पदमिनिगिरीपछाराखाय १६७
होश उड़ाने महरानी के पीले अंग भये अधिकाय ॥
थर थर देही काँपन लागी रोवाँ सकल उठे तन्नाय १६८
यह गति देख्यो महरानी कै तब गहिलीन कनौजीराय ॥
चूम्यो चाट्यो बदन लगायो धीरज फेरिदीनअधिकाय १६६
रानी पदमिनि पलँगा बैठी नैनन आँसू रही बहाय ॥
बोले लाखनि तब पदमिनि ते रानी काह गयी बौराय १७०
बिटिया आहिउ का बनिया की जो रण सुनिकै गयी डराय ॥
भरम न राखै क्षत्रानी मन रानी साँचदीन बतलाय १७१
सुनि सुनि बातें लखराना की रानी गयी सनाकाखाय ॥
मनमा शोचै मनै विचारै मनमन बारबार पछिताय १७२
धीरज धरिकै पदमिनि बोली प्रीतम साँच देयँ बतलाय ॥
कहे रुकाचिन के लाग्यो ना नहिं सब जैहैं कामनशाय १७३
कहाँ कनौजी तुम महराजा चाकर कहाँ बनाफरराय ॥
नौकर स्वामी की समता ना विद्या काह दयी बिसराय १७४
बनते कन्या धरि आई ती त्यहिके अर्ही बनाफरराय ॥
अर्ही कुकरहा परिमालिक के तुम्हरीकीनगुलामीआय १७५
साथ गुलामन औ राजा का कहँ तुम पढ़ा कनौजीराय ॥
किरिया कीन्ही जो ऊदन ते स्वामी ताहि देउ बिसराय १७६