आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 469, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें६ आल्हखण्ड । ४६८
दीख्यो जगनिक को चौंडाने गंरई हाँक दीन ललकार ॥
देउ बछेड़ा हरनागर को पाछे जाउ नदी के पार ४७
इतना सुनिकै जगनायक जी चौंडै बोले बचन सुनाय ॥
लौटिकै अइहैं जब कनउज ते घोड़ा तुरत दिहैं पठवाय ४८
ऐसे घोड़ा हम देहैं ना मानो कही चौंड़ियाराय ॥
इतना सुनिकै चौंड़ा बकशी आपन हाथी दीन बढ़ाय ४६
ऐंड़ लगायो जगनायक जी हौदा उपर पहुँचे जाय ॥
लीन्ह्यो कलँगी शिर चौंडाकी चौंडा बहुत गयो शरमाय ५०
लैके कलँगी जगनायक जी नदी निकरि गये वा पार ॥
चौंड़ा बकशी फिरि बोलत भा मानो घोड़े के असवार ५१
तुम अस योध्या हैं मोहबे मा कस ना राज्यकरें परिहिवार ॥
कलँगी हमरी अब दै देवो जावो आप कनौजै हाल ५२
इतना सुनिकै जगनायक जी बोले सुनो चौंड़ियाराय ॥
कलँगी तुम्हरी हम ऊदन को कनउजशहरदिखाउबजाय ५३
इतना कहिकै जगनायक जी अपनो घोड़ा दीन बढ़ाय ॥
तीनि दिनौना को धावाकरि कुड़हरितुरतगयोनगच्याय ५४
जेठ महीना ठीक दुपहरी शिरपर घामगयो बहुआय ॥
बरगद दीख्यो इक जगनायक डारन रही सघनता छाय ५५
तहँहीं बाँध्यो हरनागर को आपो सोयो जीन बिछाय ॥
दीख किसानन तहँ घोड़ा का औ असवार निहारा आय ५६
सोवत दीख्यो जगनायक को घोड़ा देखि गये हर्षाय ॥
करें बतकही तहँ आपस मा ऐसो घोड़ दीख नहिं भाय ५७
करत बतकही सब आपस में अपने धाम पहुँचे आय ॥
बात फैलिगै यह कुड़हरिमा गंगा कान परी तब जाय ५८