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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 468

आल्हाकामनावन । १६७ ५
नहीं तो होते मलखे ठाकुर कैसे चढ़त पिथौरा आय ॥
जियत न जैबे हम कनउजको कौवा मरे हाड़ लै जाय ३५
इतना सुनिकै मल्हना बोली दोऊ नैनन नीर बहाय ॥
राखो ईजति यहि समया मा जल्दी जाउ कनौजै धाय ३६
शोच बिचारन की विरिया ना मैंने बारबार बलिजायँ ॥
इतना सुनिकै जगनिक बोले माई साँच देयँ बतलाय ३७
घोड़ा मँगावो हरनागर को अबहीं जाउँ तड़ाकाधाय ॥
इतना सुनिकै रानी मल्हना ब्रह्मै खबरि दीन पठवाय ३८
माहिल ब्रह्मा जहँ बैठे थे चेरी तहाँ पहुँची जाय ॥
कह्यो सँदेशा सो मल्हना को दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ३६
सुनि संदेशा रनि मल्हनाका बोला उरई का सरदार ॥
घोड़ न देवो जगनायक कों ब्रह्मा मानु कही यहिबार ४०
आल्हा रूठे हैं मोहवे ते कनउज बसे बनाफरराय ॥
घोड़ तुम्हारो फिरि देहैं ना तुमते साँच दीन बतलाय ४१
कहा न माना कछु माहिलका ब्रह्मा घोड़ दीन कसवाय ॥
बड़ी खुशहाली सों जगनायक सबको यथा योग शिरनाय ४२
मनियादेवनको सुमिरन करि घोड़ा उपर भयो असवार ॥
जहाँ पिथौरा दिल्ही वाला पहुँचा उरई का सरदार ४३
खबरि सुनाई जगनायक की माहिल बारबार समुझाय ॥
लेउ बछेड़ा अब हरनागर मानो कही पिथौराराय ४४
इतना सुनिकै पृथीराज ने चौंड़ा बकशी लीन बुलाय ॥
कहि समुझावा सब चौंड़ा ते यहु महराज पिथौराराय ४५
हुकुम पायकै महाराजा को चौंड़ा कूच दीन करवाय ॥
नदी बेतवा के ऊपरमा जगनिक गयो तड़ाका ध्याय ४६