आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 466, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ेंआल्हाकामनावन । ४६५ ३
मल्हनावोली फिरिमाहिल ते काहे चढ़े पिथौराराय ॥
इतना सुनिकै माहिल बोले बहिनी साँच देयँ बतलाय ११
उड़न बछेड़ा पाँचो चाहें पारस चहैं पिथौराराय ॥
डोला चाहें चन्द्रावलि का ताहर साथ बियाही जाय १२
बैठक चाहें खजुहागढ़ की चाहें राज ग्वालियर क्यार ॥
इतना लीन्हे बिन जैहैं ना राजा दिल्ली के सरदार १३
सुनिकै बातें ये माहिल की मल्हना गई सनाकाखाय ॥
धीरज धरिकै फिरि बोलति भै पिरथी देउ जाय समुझाय १४
बारह दिनकी मुहलति देवैं त्यरहें डाँड़ लेयँ भरवाय ॥
जबै बनाफर उदयसिंह थे तब नहिं अये पिथौराराय १५
देखि अनाथन ह्याँ तिरियनको लूटन अये अधर्मीराय ॥
धर्मी होवैं तो मोहलति अब बारह दिन की देयँ कराय १६
त्यरहें पावैं जो पिरथी ना मुहबा शहर लेयँ लुटवाय ॥
हथी पछारा था द्वारे पर जायकै जबै लहुरखाभाय १७
मलखे ठाकुर जब सिरसा थे तब नहिं अये पिथौराराय ॥
इतना कहिकै मल्हना रानी नीचे बैठी शीश झुकाय १८
बोलि न आवा जब मल्हनाते माहिल बोले बचन बनाय ॥
बारह दिन लौं बुलै पिथौरा पहिले मूड़ देउँ कटवाय १६
त्यरहें दिन जो लुटै पिथौरा तौ माहिल कै जनै बलाय ॥
बैर बिसाहा मलखे ऊदन ताते चढ़े पिथौरा धाय २०
इतना कहिकै माहिल चलिभे तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥
जो कछु भाषा मल्हनारानी माहिल यथातथ्य गा गाय २१
कछु नहिं ब्वाला दिल्लीवाला मल्हना गाथ सुनो यहि बार ॥
मल्हना सोचै मन अन्तर मा अबधौं कवन बचावनहार २२