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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 465, कुल 618 में से

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पृष्ठ 465

२ आल्हखण्ड । ४६४
जो तन त्यागै श्री काशी मा सो नर चला जाय भवपार ४
है रजधानी गिरिजापति कै जाहिर तीनि लोक यहिवार ॥
अल्हा मनावन को अबजाई मैने जौनु चँदेले क्यार ५
अथ कथाप्रसंग ॥
लिल्ली घोड़ी का चढ़वैया माहिल उरई का परिहार ॥
काम औ धंधा कछु ज्यहिके ना केवल चुगुलिन का बयपार १
सोयकै जागा सो उरई मा घोड़ी तुरत लीन कसवाय ॥
चढ़िकै घोड़ी माहिलठाकुर दिल्ली शहर पहुँचा जाय २
बड़ी खातिरी पिरथी कीन्ह्यो अपने पास लीन बैठाय ॥
समय पायकै माहिल बोले मानो कही पिथौराराय ३
आल्हा ऊदन हैं कनउज मा मोहबा आपु लेउ लुटवाय ॥
ऐसो अवसर फिरि मिलिहै ना मानो कही पिथौराराय ४
इतना सुनिकै पृथीराज ने डंका तुरत दीन बजवाय ॥
चन्दन गोपी ताहर सजिगे मनमा श्रीगणेश पद ध्याय ५
लैके फौजै सातलाखलों पिरथी कूच दीन करवाय ॥
कीरतिसागर मदनतालपर पहुँचा फेरि पिथौरा आय ६
तम्बू गड़िगे चौगिर्दा सों सब रँग ध्वजारहे फहराय ॥
पिरथी बोले फिरि माहिलते राजै खबरि सुनाबो जाय ७
हाल हमारो सब जानत हौ तुमते कहौं काह समुझाय ॥
इतनासुनिकै माहिल चलिभे पहुँचे जहाँ अँदेलेराय ८
हाल बनायो परिमालिक ते माहिल झूठ साँच समुझाय ॥
सुनिकै बातें माहिल मुखते राजा गये सनाकाखाय ९
अवापसीना परिमालिक के शिर सों छत्र गिरामहराय ॥
खबरि पायकै मल्हना रानी माहिलमहल लीनबुलवाय १०