आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकीरतिसागरकामैदान । ४५५ ३१
अब हम जावत त्यहि दलमाहैं जयहिमालड़े चँदेलाराय १३६
जितने योगी हैं सागर में सबियाँ बेगि होयँ तय्यार ॥
लाखनि आये हैं मुर्चा ते तिनकेसाथ चलैं सरदार १३७
इतना सुनिकै सबियाँ योगी तुरतै होन लागि तय्यार ॥
हिरासिंह.बिरासिंह बिरियावाले चन्दन दतिया के सरदार १३८
चिंता राजा रुसनीवाला औ पतउँज के मदनगुपाल ॥
पूरनराजा पूरा वाला जगमनिजिन्सीकानरपाल १३६
बारह कुँवर बनौधा वाले चारो गाँजर के सरदार ॥
चिन्ता दूसर गोरखपुर के रूपनि मधुकरसिंह उदार १४०
ये सब योगी सजि सागर में रणका चलन हेतु तय्यार ॥
मीराताल्हन बनरस वाले सिरगा घोड़ेपर असवार १४१
सुमिरि भवानी फूलमती को हाथी चढ़ा कनौजीराय ॥
सुमिरि शारदा मैहरवाली आगे चला बनाफरराय १४२
उतसों सेना पृथीराज की सोऊ गई बरोबरि आय ॥
चली सिरोही फिरि सागरपर अद्भुतसमरकहा ना जाय १४३
ना मुँह फेरैं कनउज वाले ना ई दिल्ली के चौहान ॥
कीरतिसागर मदनताल पर क्षत्रिन कीन खूब मैदान १४४
कटि कटि कल्ला गिरैं बछेड़ा चेहरा गिरैं सिपाहिन केर ॥
बिना सूँढ़ि के हाथी घूमैं मारैं एक एकको हेर १४५
आदिभयङ्कर का चढ़वैया यहु महराज पिथौराराय ॥
भूरी हथिनी पर लखराना सम्मुखगयो तड़ाकाआय १४६
ब्रह्मा ताहर का मुर्चा है दोऊ खूब करैं तलवार ॥
चौंड़ा ऊदन का रण सोहै धाँधू बनरस का सरदार १४७
सवापहर लों चली सिरोही नदिया बही रक्त की धार ॥