आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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ऊदन ऊदन कै गुहरावै कहँ तुम गये फंनाफरराय १२४
लाउ शारदा यहि समया मा आल्हा केर लहुरवा भाय ॥
बिना इकेले बघऊदन के डोला कौन छुड़ाई जाय १२५
सदा भवानी ज्यहि दाहिनहैं ज्यहिघर सिद्धिकरैं गनेश ॥
पारस पत्थर ज्यहिके घर मा पूरित विभो सदा धनेश १२६
भई सहायी शारद मायी ऊदन आयगये त्यहिकाल ॥
हाथ जोरिकै योगी बोले लाला देशराजके लाल १२७
भिक्षा पावैं जो मैया हम तौ अब हरद्वार को जायँ ॥
इतना सुनिकै मल्हना रोई बोली आरत वैन सुनाय १२८
रही न ईजति अब मोहवे की पलकी लीन चौंड़िया आय ॥
जायकै पहुँचा पाँच विरवातर हा दैयागति कही न जाय १२६
विना बेंदुला के चढ़वैया नैया कौन लगैहै पार ॥
चीरिकै धरती ऊदन आवो ईजति राखिलेउ यहिवार १३०
इतना सुनिकै ऊदन योगी घोड़ा तुरत दीन रपटाय ॥
जायकै पहुँचा पाँच विरवातर यहु रणबाघ लहुरवाभाय १३१
चौंड़ा दीख्यो जब ऊदन का सम्मुख हाथी दीन बढ़ाय ॥
औ ललकारा फिरि योगी का काहे प्राण गवाँवो आय १३२
इतना सुनिकै ऊदन योगी गरुई हाँक दीन ललकार ॥
डोला धरिदे चन्द्रावलि का चौड़ामानुकही यहि बार १३३
धोखे योगी के भूले ना अबहीं योग देउँ दिखलाय ॥
ऐंड़ लगाई फिरि बेंदुल के हाथी उपर पहुँचा जाय १३४
ढाल कि औझड़ ऊदन मारी चौंड़ा गयो मूर्छाखाय ॥
लैके डोला चन्द्रावलि का मल्हनापास दीनरखवाय १३५
देवा ठाकुर ते फिरि बोले अब तुम रहो यहाँपर भाय ॥