आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकीरतिसागरकामैदान । ४४७ २३
'नहीं सुहागिल कोउ वचिहै ना मोहवा रंडन सों भरिजाय ४२
इतना सुनिकै अभई बोले रण माँ दोऊ भुजा उठाय ॥
हम नहिं देखें गति काहूकै डोला पासजाय नगच्याय ४३
पर्व आपनी पूरी करिकै अबहीं कूच देव करवाय ॥
रारि मचाये कछु पैहौ ना साँची बात दीन बतलाय ४४
अबै मोहोवा अस सूना ना जैसा समझि लीन सरदार ॥
मूड़ न रहैं जब देही मा तवहूं रुण्ड करैं तलवार ४५
इतना सुनिकै ताहर ठाकुर लाशौ फौज दीन पठवाय ॥
हुकुम लगावा रजपूतन का इनके देवो मूड़ गिराय ४६
हुकुम पाय कै यह ताहर का लागे लड़न शूर सरदार ॥
पैदल पैदल कै बरणी मै औ असवार साथ असवार ४७
भाला वलंछी छूटन लागे पागे मोद शूर त्यहि बार ॥
अपन परावा कछु सूझै ना आमाझोर चलै तलवार ४८
कटि कटि कल्ला गिरैं खेत माँ उठि उठि रुण्ड मचावैं मार ॥
को गति बरणै त्यहि समया कै नदिया बही रक्तकी धार ४९
मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥
यहु रणनाहर मल्हनावाला आल्हा मोहबे का सरदार ५०
जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे सिंह बिडारै गाय ॥
तैसे मारै रजपूतन का छप्पन दीन्हे मूड़ गिराय ५१
बड़ा प्रतापी रण नाहर यहु यहिके बाँट परी तलवार ॥
यहिके मारे हाथी गिरिगे मरिगे सूरजसे सरदार ५२
रंजित नामी यहु ठाकुर जो रणमाँ भली मचाई रार ॥
पटा बनेठी बाना फेंकें टेकें दऊ हाथ तलवार ५३
लोह कि टोपी शिर में धारे सब्जा घोड़ेपर असवार ॥