आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० आल्हखण्ड । ४३४
पर्व भुजरियन के मूड़ेपर पृथ्वी गाँसि मोहोबा लीन ॥
कैसे जैबे हम सागर पर पवनी खोंटि विधातै कीन ६३
प्यारी बेटी चन्द्रावलि घर ऊदन लाये बिदाकराय ॥
सो नहिं जैहै जो सागर पर हमरी जियत मौत है जाय ६४
बेटी ठाढ़ी चन्द्रावलि तहँ नैनन आँस रही ढरकाय ॥
जैसो योगी यहु ठाढ़ो है ऐसो मोर लहुरवा भाय ६५
हाय ! अकेले बिन ऊदन के गड़बड़ परा नगर में आय ॥
ऊदन मलखे की समता का तीसर भयो कौन जगमाय ६६
मोहिं अभागिनि के कर्मन ते दूनों भाई गये हिराय ॥
कह्यो संस्कृत मा ऊदन ते लाखनिराना बचन सुनाय ६७
नाम बताओ तुम मल्हना ते काहे धरी निठुरता भाय ॥
कह्यो संस्कृत मा ऊदन तब तुम सुनिलेउ कनौजीराय ६८
नाम बतावैं जो मल्हना ते हमरी जियत मृत्यु है जाय ॥
इतना कहिकै लखराना ते मल्हनै बोले वचन सुनाय ६६
शोच न राखो कछु मन अन्तर रानी साँच देयँ बतलाय ॥
पर्व तुम्हारी हम करवैहैं अपनो योग दिहैं दिखलाय १००
काह हकीकति है पिरथी कै गड़बड़ करै परव में आय ॥
हैं अनगिनती योगी सँगमा झावर डेरादीन गड़ाय १०१
करी लबरई पिरथी राजा दिल्ली ताल देव करवाय ॥
कीन इशारा फिरि लाखनि तन आपन गुरूदीन बतलाय १०२
गुरु जानिकै लखराना को चन्द्रावलि ने कहा सुनाय ॥
होय सनीनो अब सागर माँ जो गुरुबाबा करो सहाय १०३
नहीं सनीनो अब मोहवे माँ साँचो नहीं परै दिखलाय ॥
लाखनि बोले चन्द्रावलि ते बहिनी साँच देयँ बतलाय १०४