आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ आल्हाखण्ड । ४२६
शिवा विहारी सब सुखकारी धारी सदा गंग को शीश ४
तिनके भुजबल बल ललितेको फलिते करैं याहि गौरीश ॥
कीरति सागर की गाथा को ललिते कहैं नायकर शीश ५
अथ कथाप्रसंग ॥
सवन सुहावन जब आवत भा तब सब चले विदेशी ज्वान ॥
कीन चढ़ाई पृथीराज ने जब मरिगये वीर मलखान १
कीरतिसागर मदनताल पर सब रँग ध्वजा रहे फहराय ॥
परा पिथौरा दिल्ली वाला आला रूप शील समुदाय २
हाल पायकै परिमालिक ने फाटक बन्द लीन करवाय ॥
बन्धन छूटैं ना गौवन के ना कउ त्रिया सेजपर जायँ ३
मारे डरके पिंडुरी काँपै मोहबा थहर थहर थर्राय ॥
बिना इकेले बघऊदन के फाटक कौन खुलावै आय ४
ऐसी बातें घर घर होवैं दर दर नारिकुण्ड अधिकाय ॥
मस्तक पीटैं कर अपने सों औ यह कथा रहीं तहँ गाय ५
होत बनाफर जो सिरसा का फाटक आज देत खुलवाय ॥
पवनी आई है मूड़ेपर लूटन अवा पिथौराराय ६
कुशल न देखें हम मुहबे मा संकट परा आज दिनआय ॥
बिना इकेले अब आल्हा के फाटक कौन खुलावै धाय ७
देवा सुलखे की मारुन मा ठहरत कौन यहांपर माय ॥
हाय गुसैयाँ की मरजी अस पवनी गई मूड़पर आय ८
कौन बचाई पृथीराज सों झंडा मदन ताल फहराय ॥
सात कोस के चौगिर्दा में तम्बू तम्बू परैं दिखाय ६
पति औ देवर भोजन करते घरमा कहैं हमारे माय ॥
तब तो बुढ़िया तिरिया बोली मन में श्रीगणेशको ध्याय १०