आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
DevanagariHindipublished618 पृष्ठ
पृष्ठ 426, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 426
अथ आल्हखण्ड ॥
कीरतिसागरकायुद्धवर्णन ॥
सवैया ॥
कीरति सिंधु शिवा शिव पै हम अक्षत चन्दन फूल चढ़ावैं ।
मानस ऐसो चहै हमरो पर आलस सों अस होन न पावै ॥
धावैं सबै दिशि पापसमूह औ हूह मचावत हूलत आवैं ।
सार यही ललिते जगको मुदसों नित शम्भु शिवा मन ध्यावैं १
सुमिरन ॥
सुमिरन करिकै शिवशङ्कर को रणमें चढ़े राम महराज ॥
एकरूप सों हनुमत ह्वैकै कीन्हे सकल रामके काज १
मुख्य स्वरूपी शिवशङ्कर के डमरू एक हाथ में राज ॥
लिहे त्रिशूलौ दुसरे हाथे मुण्डनमाल गरे में भ्राज २
भस्म रमाये सब अंगन में खाये भंग धतूरा ईश ॥
कण्ठ हलाहल अतिसोहत है सोहैं श्वेतवरण जगदीश ३
नग्न अमंगल मंगलकारी हारी तीनि ताप वागीश ॥४