आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 424, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ेंसिरसाकासमर । ४२३ १६
नाक चपावैं ते अँगूठा ते ऊपरश्वासचढ़ावत जायें १३०
तैसे करिकै गजमोतिन ह्याँ ऊपर हवा दीन पहुँचाय ॥
जब फुफकारयो पति शव लैकै हाहाकार अग्निगै आय १३१
भम्भम्भम्भम् चन्दन लकड़ा सुलगनलागि तहाँपर भाय ॥
हाय पियारे बघऊदन के मारे गये बनाफरराय १३२
भाय पियारो ऊदन होते दिल्ली शहर देत फुँकवाय ॥
हाय विधाता यह गति कीन्ही न्यारे भये बनाफरराय १३३
कौन दुसरिया जग दादा को इन्दल पूत बड़ा बरियार ॥
मरत न देखा यहि समया मा देवर उदयसिंह सरदार १३४
जो हम जानति यह गतिहोई तुमका लेति तुरत बुलवाय ॥
दगा न करते दिल्ली वाले तौकसमरतिप्राणपतिआय १३५
कड़कै धड़कै फड़कै छाती ऐसो देखि शूर सरदार ॥
यहै मनाऊं औ ध्याऊं नित स्वामी दीनबन्धुकर्त्तार १३६
जहाँ जहाँ जन्मैं ये स्वामी मम तहँ तहँ होयँ मोरि भर्त्तार ॥
अग्नि प्रज्वलित त्यहिसमयाभै लागे जरन सबै श्रृंगार १३७
गमकै ढोलक त्यहि समया माँ धमकै थाप नगारे भाय ॥
चम्चम् चमकै गजमोतिनितहँ दमकैजरनहेमअधिकायं १३८
माता बिरमा मोती मूंगा सुवरण बस्त्रदीन छिरकाय ॥
रही न आशा धन लेबे की मलखेसोचतहूँअधिकाय १३६
ऐस प्रतापी नित होवैं ना ज्ञानी पुरुष विचारैं भाय ॥
दानी ध्यानी अभिमानी सब शोचैं सीयराम शिरनाय १४०
घरी न बीती ह्याँ महरानी पहुँची स्वर्गलोक में जाय ॥
तहँहूँ सोचै सुख मल्हना को जाविधिदीनरहैअधिकाय १४१
सबियाँ रैयाति मलखाने की दर दर रोय रही अधिकाय ॥