आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ आल्हखण्ड । ४२२
सुनिकै बातें हरिकारा की विरमा गिरी मूच्छाखाय ११८
खबरि पायकै गजमोतिनि तहँ फिरिउठिबैठिफिरि गिरिजायाँ ॥
सासु पतोहू बैली ह्वैकै शिरधुनिबारबार पछितायँ ११९
सुयश बखानैं मलखाने का महलन गई उदासी छाय ॥
सात पांच दश जुरीं सहिलरी सम्मत देन लगींसो आय १२०
तब गजमोतिनि विरमा दूनों पलकी लीन तहाँ मँगवाय ॥
सुमिरि गजानन लम्बोदर को गौरा पारवती पद ध्याय १२१
चढ़ी पालकी सासु पतोहू पहुंचीं समरभूमि में आय ॥
गदहन पृथ्वी को जुतवावै यहु महराज पिथौराराय १२२
तब गजमोतिनि ने ललकारा यह सुनि लेउ वीर चौहान ॥
यह ना जान्यो अपने मनते की मरिगये वीर मलखान १२३
सुनी पतिव्रतकी महिमा ना ताते चढ़ी तुम्होरे शान ॥
हम जबलेबे तलवारी को तब नहिं रही तुम्हारोमान १२४
बातें सुनिकै गजमोतिनि की पृथ्वी कूच दीन करवाय ॥
कैयो दिन का धावा करिकै दिल्ली शहर पहुंचे आय १२५
लाश देखिकै मलखाने कै माता तुरत गई लपटाय ॥
उठै औ बैठै गिरि गिरि जावै रानीदशा कही ना जाय १२६
विपदा बरणौं गजमोतिनिकै तौ फिरिएकसाल लगिजाय ॥
सखी सहिलरी तहँ समुझावैं विरमा धीरज रही कराय १२७
तेज पतिव्रत का जाहिर है जाते सत्त चढ़ा अधिकाय ॥
चिता लगावा गा चन्दन सों रानी बैठि सरापर जाय १२८
सुमिरि भवानी महरानी को पतिशिर धरा जाँघपर आय ॥
हवा खैंचिकै सब देहीकै शिरपरदीनतुरतपहुंचाय १२६
संध्या वाले यह गति जानैं प्राणायाम करें जे भाय ॥