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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 414

सिरसाकासमर । ४१३ ३

  • आशिर्वाद देउ जल्दी सों जामें काम सिद्ध है जाय १२
    चढ़ा पिथौरा है सिरसा पर माता हुकुम देउ फरमाय ॥
    बिरमा बोली तब मलखे ते तुम्हरो बार न बाँका जाय १३
    चरण लागिकै महतारी के मलखे कूच दीन करवाय ॥
    चौंड़ा ताहर चन्दन बेटा तीनों परे तहाँ दिखलाय १४
    चौंड़ा बोला मलखाने ते मानो कही बनाफरराय ॥
    किला गिराय देउ सिरसा का दीन्ह्यो हुकुम पिथौराराय १५
    इतना सुनिकै मलखे बोले चौंड़ा काह गये बौराय ॥
    अपने हाथे हम बनवाया हमहीं देवैं किला गिराय १६
    जो कछु ताकति हो पिरथीकी सो अब हमैं देयँ दिखलाय ॥
    असगति नाहीं है पिरथी कै हमरो किला देयँ गिरवाय १७
    सुनिकै बातें मलखाने की चौंड़ा लागु दीन लगवाव ॥
    झुके सिपाही दुहुँतरफा के मारैं एक एक को धाय १८
    पैदल पैदल कै बरणी मै और असवार साथ असवार ॥
    मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्त की धार १६
    अपन परावा क्यहु सूझैना दूनों हाथ करैं तलवार ॥
    मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लाग पहार २०
    जैसे भेड़िन भेड़हा पैठे जैसे अहिर बिडारै गाय ॥
    तैसे मारै मलखे ठाकुर रणमा क्षत्रिन खेलखिलाय २१
    बहुतक घायल भे खेतनमों बहुतक हैगे बिना परान ॥
    फिरि फिरि मारै औ ललकारै नाहर समरधनी मलखान २२
    चढ़ा चौंड़िया इकदन्तापर गरुई हाँक देय ललकार ॥
    मोरि लालसा यह छावति है ठाकुर सिरसा के सरदार २३
    मेरे सिपाहिन का पैहौ तुम ठाकुर मोरि तोरि तलवार ॥