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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 413

२ आल्हाखण्ड । ४१२
अथ कथाप्रसंग ॥
एक समैया माहिल ठाकुर लिल्ली घोड़ापर असवार ॥
तिकृतिकृतिकृतिकूघोड़ीहांकत पहुंचे दिल्ली के दर्बार १
आवत दीख्यो जब माहिल को पिरथी कीन बड़ा सत्कार ॥
आवो आवो बैठो बैठो ठाकुर उरई के सरदार २
कुशल बतावो अब मोहबेकी नीके राजकरैं परिमाल ॥
इतना सुनिकै माहिल बोले साँची सुनो आप नरपाल ३
अवसर नीको यहि समया माँ तुम्हरे हेतु रचा कर्त्तार ॥
आल्हा ऊदन गे कनउज का राजा जयचँद के दरबार ४
भले बुरे जो दिन बीतत हैं आवैं फेरि नहीं सो हाथ ॥
त्यहिते तुमका समुझावत हैं साँची सुनो धरणि के नाथ ५
सिरसा मोहबा यहि समया माँ दूनों आप लेउ लुटवाय ॥
सुनिकै बातें ये माहिल की भा मनखुशी पिथौराराय ६
सात लाख फिरि फौजैं लैंकै तुरतै कूचदीन करवाय ॥
चारकोस जब सिरसा रहिगा तम्बू तहाँ दीन गड़वाय ७
हुकुम लगायो महराजा ने सिरसा किला गिरावाजाय ॥
तब हरकारा सिरसा वाला मलखेखबरि जनावा आय ८
फौजैं आईं पृथीराज की ओ महराज बनाफरराय ॥
इतना सुनिकै मलखे ठाकुर डंका तुरत दीन बजवाय ६
हुकुम लगायो अपने दलमा फौजैं होन लगीं तय्यार ॥
तुरत कबूतरी पर चढ़िबैठा नाहर सिरसा का सरदार १०
छींक तड़ाका भै सम्मुख मा माता बोली वचन सुनाय ॥
तुम नहिं जावो अब मुर्चा को मानो कही बनाफरराय ११
इतना सुनिकै मलखे बोले माता साँच देयँ बतलाय ॥