आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ आल्हाखण्ड । ४०२
बहे पनारा नरदेहिन सों नदिया बही रक्त की धार ॥
लंबी धोतिन के पहिरैया क्षत्री जूझे तीनि हजार ११८
साल दुसाला मोहनमाला आला परे गले में हार ॥
ऐसे सुन्दर राजपूतन को नोचनलागे श्वानसियार ११९
गीधन केरी खूब बनिआई चील्हन भीर भई अधिकाय ॥
लगीं बजारैं तहँ कौवनकी कालीभूमि परै दिखलाय १२०
लगी अथाई तहँ भूतन की प्रेतन कथा कही ना जाय ॥
यहु अलबेला आल्हा वाला गर्जा समर भूमिमाआय १२१
इन्दल ठाकुर के सम्मुख मा कोऊ शूर नहीं समुहाय ॥
चढ़ि पचशब्दा हाथी ऊपर आल्हागये समरमें आय १२२
यहु महराजा पट्टी वाला मारत फिरै शूर समुदाय ॥
आल्हा ठाकुर औ सातनि का परिगासमर बरोबरिआय १२३
सातनि बोला तब आल्हाते मानो कही बनाफरराय ॥
दीन न पैसा हम जयचंद को कैयो बार लड़ेते आय १२४
टका न पैहौ आल्हा ठाकुर याते कूच देउ करवाय ॥
इतना सुनिकै आल्हा बोले सातनि काहगयो बौराय १२५
बहुती बातें हम जानैं ना पैसा आज देउ मँगवाय ॥
नहिं दिखलावै अब संगर में जोकछुकीन बूततबजाय १२६
सुनिकै बातें ये आल्हा की सातनि खैंचि लीन तलवार ॥
हनिकै मारा सो आल्हा के आल्हालीन ढालपरवार १२७
भालामारा फिरि आल्हा के सोऊ लीन्ही वार बचाय ॥
गदा करावा सातनि राजा सो शिरपरी महाउतआय १२८
गिरा महाउत जब आल्हा का इन्दल दीन्ह्यो घोड़ उड़ाय ॥
पहुंचा घोड़ा जब हौदापर इन्दलमार्यो ढालघुमाय १२६