आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन्दलहरण । ३४६ ३३
पटा बनेठी बाना जानैं तेनर मारैं गदा चलाय २०३
बलखबुखारे का अभिनन्दन मलखे साथ करै तलवार ॥
हंसा ठाकुर उदयसिंह ये दोऊ लड़ैं तहाँ सरदार २०४
सुख्खालड़िका अभिनन्दनका मकरँद नरपति राजकुमार ॥
अपने अपने दउ मुर्चा मा मारैं एक एक ललकार २०५
देवाठाकुर औ मोहन का परिगा समर बरोबरि आय ॥
बड़ी लड़ाई क्षत्रिन कीन्ह्यो कायर भागे पीठि दिखाय२०६
जितने कायर दुहुँतरफा के तरलोथिन के रहे लुकाय ॥
हेला आवै जब हाथिन का तब बिन मरे मौत है जाय २०७
कागति बरणौं मैं कायर कै मनमा बार बार पछितायँ ॥
हाय रुपैयन के लालच ते हमरे गई प्राणपर आय २०८
करत नौकरी क्यहु बनियांके हल्दी धनियां के बयपार ॥
तौ नहिं बिपदा हमपर आवत छूटत नहीं लोग परिवार २०६
कायर सोचैं यह अपने मन शूरन होयँ अनन्दाचार ॥
गिरि उठि मारैं समरभूमि में दोऊ हाथ करैं तलवार २१०
छाँड़ि आसरा जिंदगानी का क्षत्रिन कीन घोरघमसान ॥
दोउदल अरुझे समरभूमिमा मारैं एकएक को ज्वान २११
कटिकटि कङ्क्षागिरैं समर में उठि उठि रुण्डकरैं तलवार ॥
मुण्डन केरे मुड़ चौरा भे औ रुण्डन के लगेपहार २१२
परीं लहासैं जो मनइन की तिनकाखावैं श्वान सियार ॥
मेला हैगा तहँ गीधन का चील्हनसीधाका व्यवहार २१३
नचैं योगिनी खप्परलीन्हे मज्जैं भूत प्रेत बैताल ॥
धरु धरु धरु धरु मारो मारो बोलै वच्छराजका लाल २१४
ऊदन ताकै ज्यहि हौदाका बैंदुल तहाँ देइ पहुँचाय ॥