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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 351

३१ आल्हखण्ड । ३४८
स्यहिकी समता का हंसा ना पै तहँ युद्ध करै विकराल १६१
कोगति वरणै तहँ हंसा कै धंसा बड़े बड़े सरदार ॥
भई प्रशंसा तहँ हंसा कै क्षत्रीडारि भागि तलवार १६२
बड़ा प्रतापी अरि परितापी सुर्खा घोड़े पर असवार ॥
गनि गनि मारै रजपूतन को क्षत्री खेलै खूब शिकार १६३
भागीं फ़ौजें मोहबेवाली आली खानदान को ज्वान ॥
आयकै गर्ज्यौ त्यहि समयामें नाहरसमरधनी मलखान १६४
अकसर मलखे के जियरे पर अरुझे बड़े बड़े सरदार ॥
जीति न पावैं मलखाने ते औमुहँ फेरिलेयँ त्यहिवार १६५
देवा बोला तब ऊदन ते ठाकुर बेंदुल के असवार ॥
अकसर मलखे के ऊपर माँ क्षत्री अरुझे तीनिहजार १६६
भागीं सेना मुहबेवाली अकसर लड़ै वीर मलखान ॥
इतना सुनिकै ऊदन चलिभा संग मचला चौंड़ियाज्वान १६७
ब्रह्मा मकरँद जगनायकजी येऊ चलतभये त्यहिवार ॥
जोगा भोगा देवा ठाकुर मन्नागूजर परम जुझार १६८
ये सब पहुँचे समरभूमि में हाथमें लिये नाँगि तलवार ॥
बलखबुखारे के क्षत्रिन को मारनलागि ढूँढ़िसरदार १६६
बड़ी कसामसि समरभूमि मै कहुँ तिलडरा भूमि ना जाय ॥
छाय लालरीगै अकाश में सबरँग ध्वजारहे फहराय २००
घोड़ा हींसैं समरभूमि में सावन यथा मेघ गहरायँ ॥
हाथी चिघरैं रणमण्डल में कायर समर न रोंकैं पायँ २०१
शूर सिपाही ईजतवाले ते तहँ मारु मारु बग्याँयँ ॥
कऊ तमंचा को धरि धमकै कोऊदेयँ गुर्ज के घाय २०२
कोऊ मारै तलवारी सों कोऊ मारैं ढाल घुमाय ॥