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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 35

३० आल्हखण्ड ।
मरा मुकुन्दा रण खेतनमें सुद्धत ठाकुर चला रिसाय ॥
तब ललकारा त्यहि हिरसिंहने ठाकुर खबरदार है जाय ६१
जयो नगीचे ना डोलाके नहिं शिर धरती देउँ गिराय ॥
सुनिकै बातें ये हिरसिंह की सुद्धत भाला लीन उठाय ६२
ताकिकै मारा सो हिरसिंह के ठाकुर लैगा वार बचाय ॥
खाली वार परी सुद्धत की तबमनगयो सनाकाखाय ६३
ऐंचि सिरोही फिरि कम्मर सों मारा हरीसिंह को जाय ॥
बचिगा ठाकुर फिरि दिल्लीका औमनकोपकीन अधिकाय ६४
खैंचिकै मारा तलवारी को सुद्धत गिरा धरणि भहराय ॥
मरिगा ठाकुर जब कनउज का आयो हम्माँ जमाँ तब धाय ६५
हम्माँ जमाँ के तब मुर्चा में गोविंद नृपति पहुँचा आय ॥
औ ललकारा फिर शूरन को तुरतै डोला लेउ उठाय ६६
डोला उठायो रण शूरन ने औ दिल्ली को चले दबाय ॥
हम्माँ जमाँ तब निज शूरन ते बोले दोऊ भुजा उठाय ६७
जान न पावैं दिल्ली वाले मारो इनका खेत खेलाय ॥
सुनिकै बातें हम्माँ जमाँ की क्रोधित चले सिपाहीधाय ६८
चलीं जुनब्बी औ गुजराती ऊना चलै विलाइति क्यार ॥
भाला बरछिन की मारुइ भई कोताखानी चलै कटार ६९
कटि कटि क्षत्री गिरे खेत माँ हाथिन लागे ऊंच पहार ॥
पैदल पैदल सों मारुइ भई औ असवार साथ असवार ७०
विकट लड़ाई क्षत्रिन कीन्ह्यो देवता कांपि उठे असमान ॥
शूर सिपाही ईजति वाले तिनतजिदीन सांसराप्रान ७१
मान न रहिगे कोउ क्षत्री के सब के टूटि गये अभिमान ॥
पृथुइराज औ जयचंद राजा दोऊ दीन लड़ाई ठान ७२